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27 सितंबर, 2010

"मुर्गें की सीख:दीन दयाल शर्मा" (प्रस्तोता-डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")


मुर्गा बोला नहीं जगाता
अब तुम जागो अपने आप।
कितनी घडियाँ और मोबाइल
रखते हो तुम अनाप-शनाप।

मैं भी जगता मोबाइल से
तुम्हें जगाना मुश्किल है
कब से जगा रहा हूँ तुमको
तू क्या मेरा मुवक्किल है।

समय पे सोना, समय पे जगना
जो भी करेगा समय पे काम
समय बड़ा बलवान जगत में
समय करेगा उसका नाम।

--------

दीन दयाल शर्मा (बाल साहित्यकार)

अध्यक्ष,
राजस्थान साहित्य परिषद्
हनुमानगढ़ संगम-335512
mob. 9414514666

22 सितंबर, 2010

"अतिवृष्टि" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

अतिवृष्टि


जब सूखे थे खेत-बाग-वन,
तब रूठी थी बरखा-रानी।
अब बरसी तो इतनी बरसी,
घर में पानी, बाहर पानी।।


बारिश से सबके मन ऊबे,
धानों के बिरुए सब डूबे,
अब तो थम जाओ महारानी।
घर में पानी, बाहर पानी।।


दूकानों के द्वार बन्द हैं,
शिक्षा के आगार बन्द है,
राहें लगती हैं अनजानी।
घर में पानी, बाहर पानी।।


गैस बिना चूल्हा है सूना,
दूध बिना रोता है मुन्ना,
भूखी हैं दादी और नानी।
घर में पानी, बाहर पानी।।


बाढ़ हो गयी है दुखदायी,
नगर-गाँव में मची तबाही,
वर्षा क्या तुमने है ठानी।
घर में पानी, बाहर पानी।।

3 टिप्पणियाँ:

M VERMA २२ सितम्बर २०१० ७:३३ अपराह्न

अति हर चीज की अच्छी नहीं होती है और अब तो वर्षा की अति हो चुकी है
सुन्दर् रचना

रावेंद्रकुमार रवि २२ सितम्बर २०१० ८:०६ अपराह्न

गीत अच्छा है,
लेकिन अब तो यही मन हो रहा है
कि बरखा रानी फिर से कुछ दिनों के लिए रूठ जाएँ!

संगीता स्वरुप ( गीत ) २२ सितम्बर २०१० ८:२२ अपराह्न

इस बार की बारिश पर बिलकुल सटीक रचना ...अति हर चीज़ की बुरी होती है ..

"अतिवृष्टि" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

अतिवृष्टि


जब सूखे थे खेत-बाग-वन,
तब रूठी थी बरखा-रानी।
अब बरसी तो इतनी बरसी,
घर में पानी, बाहर पानी।।


बारिश से सबके मन ऊबे,
धानों के बिरुए सब डूबे,
अब तो थम जाओ महारानी।
घर में पानी, बाहर पानी।।


दूकानों के द्वार बन्द हैं,
शिक्षा के आगार बन्द है,
राहें लगती हैं अनजानी।
घर में पानी, बाहर पानी।।


गैस बिना चूल्हा है सूना,
दूध बिना रोता है मुन्ना,
भूखी हैं दादी और नानी।
घर में पानी, बाहर पानी।।


बाढ़ हो गयी है दुखदायी,
नगर-गाँव में मची तबाही,
वर्षा क्या तुमने है ठानी।
घर में पानी, बाहर पानी।।

17 सितंबर, 2010

“काला कागा” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

crow_11jpgरंग-रूप है भूरा-काला।
लगता बिल्कुल भोला-भाला।।
housecrowjpgजब खतरे की आहट पाता।
काँव-काँव करके चिल्लाता।।
IMG_2031small Copyउड़ता पंख पसार गगन में।
पहुँचा बादल के आँगन में।।
crow2031JPGशीतल छाया मन को भायी।
नाप रहा नभ की ऊँचाई।।
चतुर बहुत है काला कागा।
किन्तु नही बन पाया राजा।।
पितृ-जनों का इससे नाता।
यह दुनिया को पाठ पढ़ाता।।
काक-चेष्टा जो अपनाता।
धोखा कभी नहीं वो पाता।

09 सितंबर, 2010

“घोड़ा” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

images (7)
मैं घोड़ा हूँ जानदार हूँ
स्वामीभक्त हूँ शानदार हूँ


खड़े-खड़े ही मैं सोता हूँ
कभी निराश नही होता हूँ 


ताकतवाला हिम्मतवाला
रणभूमि का हूँ मतवाला


युद्धक्षेत्र या कर्मक्षेत्र हो
अश्वमेध का धर्मक्षेत्र हो


इंजन हूँ मैं बिना भाप का
चेतक हूँ राणा प्रताप का
chetak

02 सितंबर, 2010

“गंगा-गइया बहुत महान” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

cow1 मेरी गइया सबसे न्यारी।
यह मुझको लगती है प्यारी।।


मम्मी इसको जब दिख जाती।
जोर-जोर से यह रम्भाती।।


मैं जब विद्यालय से आता।
अपनी गइया को सहलाता।। 
PRANJAL_COWतब यह गर्दन करती ऊपर।
रखने को मेरे काँधे पर।।


भोली-भाली इसकी सूरत।
ममता की यह लगती मूरत।।
images (6) गंगा-गइया बहुत महान।
ये हैं भारत की पहचान।।


स्वर्ग हमें धरती पर लाना।
इसीलिए है इन्हें बचाना।।