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14 नवंबर, 2015

"बाल-दिवस-पं. नेहरू को शत्-शत् नमन" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


राष्ट्र-नायक पं. नेहरू को शत्-शत् नमन!

चाचा नेहरू तुमने 

प्यारे बच्चों को ईनाम दिया था।
अपने जन्म-दिवस को 
तुमने बाल-दिवस का नाम दिया था।

फूलों की मुस्कानों से महके उपवन।
बच्चों की किलकारी से गूँजे आँगन।।

एक साल में एक बार ही बाल दिवस आता है।
मास नवम्बर नेहरू जी की हमको याद दिलाता है।।

लाल-जवाहर के सीने पर सजा सुमन है।
अभिनव भारत के निर्माता तुम्हें नमन है।।

14 अगस्त, 2015

बालकविता "प्रांजल-प्राची की नयी स्कूटी" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

आज हमारे लिए हमारे,
बाबा जी लाये स्कूटी।
वैसे तो काले रंग की है,
लेकिन लगती बीरबहूटी।।

इस प्यारी सी स्कूटी में,
खर्च नहीं बिल्कुल ईंधन का।
चार्ज करो इसको बिजली से,
संवाहक यह संसाधन का।।

अपने घर से विद्यालय की,
थोड़ी सी ज्यादा है दूरी।
पैदल-पैदल जाना पड़ता,
भारी बस्ता है मजबूरी।।

मेरा भइया स्कूटी को,
सीख रहा है अभी चलाना।
इसी सवारी से अब अपना,
विद्यालय को होगा जाना।।

मैं भी खुश हूँ, भइया भी खुश,
नयी सवारी को पा करके।
समय बचेगा, श्रम कम होगा,
पढ़ें-लिखेंगे हम जी भर के।।

05 मार्च, 2015

“होली का त्यौहार” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


गुड़िया गुझिया बना रही है,
दादी पूड़ी बेल रही है।
 

कभी-कभी पिचकारी लेकर,
रंगों से वह खेल रही है।।

तलने की आशा में आतुर
गुझियों की है लगी कतार।

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घर-घर में खुशियाँ उतरी हैं,
होली का आया त्यौहार।।

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मम्मी जी दे दो खाने को,
गुझिया-मठरी का उपहार।
सजता गुड़िया के नयनों में,
मिष्ठानों का मधु-संसार।।

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सजे-धजे हैं बहुत शान से
मीठे-मीठे शक्करपारे।
कोई पीला, कोई गुलाबी,
आँखों को ये लगते प्यारे।। 


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होली का अवकाश पड़ गया,
दही-बड़े कल बन जायेगें।
चटकारे ले-लेकर इनको,
बड़े मजे से हम खायेंगे।।


24 सितंबर, 2014

"नेशनल दुनिया में मेरी बालकविता-गुब्बारे" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

नई दिल्ली से प्रकाशित होने वाले 
दैनिक समाचार पत्र "नेशनल दुनिया"
में मेरी बाल कविता

"गुब्बारे"
बच्चों को लगते जो प्यारे।
वो कहलाते हैं गुब्बारे।।
 
गलियोंबाजारोंठेलों में।
गुब्बारे बिकते मेलों में।।
 
कालेलालबैंगनीपीले।
कुछ हैं हरेबसन्तीनीले।।
 
पापा थैली भर कर लाते।
जन्म-दिवस पर इन्हें सजाते।।
 
फूँक मार कर इन्हें फुलाओ।
हाथों में ले इन्हें झुलाओ।।
सजे हुए हैं कुछ दुकान में।
कुछ उड़ते हैं आसमान में।।
मोहक छवि लगती है प्यारी।
गुब्बारों की महिमा न्यारी।।