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"हम प्रसून हैं अपने मन के" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

>> 10 February, 2012

हम प्रसून हैं अपने मन के
[DSCI0030.JPG]
गन्घ भरे हम सुमन चमन के।
हम प्रसून हैं अपने मन के।।

आँगन में खिलते-मुस्काते,
देशभक्ति की अलख जगाते,
हम हैं कर्णधार उपवन के।
हम प्रसून हैं अपने मन के।।

जो दुनिया में सबसे न्यारी,
जन्मभूमि वो हमको प्यारी,
उगते रवि हम नीलगगन के।
हम प्रसून हैं अपने मन के।।

ऊँचे पर्वत और समन्दर,
रत्न भरे हैं जिनके अन्दर,
पाठ पढ़ाते जो जीवन के।
हम प्रसून हैं अपने मन के।।

हिन्दू-मुस्लिम-ईसाई हैं,
आपस में भाई-भाई हैं,
इक माला के हम हैं मनके।
हम प्रसून हैं अपने मन के।।

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"मिलने आना तुम बाबा" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

>> 20 January, 2012


पापा की लग गई नौकरी,
देहरादून नगर बाबा।
कैसे भूलें प्यार आपका,
नहीं सूझता कुछ बाबा।।

छोटा घर है, नया नगर है,
सर्द हवा चलती सर-सर है,
बन जायेंगे नये दोस्त भी,
अभी अकेले हैं बाबा।

प्यारे चाचा-दादी जी की,
हमको याद सताती है,
विद्यालय की पीली बस भी,
गलियों में नहीं आती है,
भीड़ बहुत है इस नगरी में,
मँहगाई भी है बाबा।

आप हमारे लिए रोज ही,
रचनाएँ रच देते हो,
बच्चों के मन की बातों को,
सहज भाव से कहते हो,
ब्लॉग आपका बिना नेट के,
कैसे हम देखें बाबा।

छोटी बहना प्राची को तो,
बाबा-दादी प्यारी थी,
छोटी होने के कारण वो,
सबकी बहुत दुलारी थी।
बहुत अकेली सहमी सी है,
गुड़िया रानी जी बाबा।
गर्मी की छुट्टी होते ही,
अपने घर हम आयेंगे,
जो भी लिखा आपने बाबा,
पढ़कर वो हम गायेंगे,
जब भी हो अवकाश आपको,
मिलने आना तुम बाबा।

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‘‘अद्भुत है मेथी की माया’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

>> 12 January, 2012

सब्जी है यह प्यारी-प्यारी।
मेथी की महिमा है न्यारी।।

गोल-गोल पत्तों वाली है।
इसमें कितनी हरियाली है।।

घोट-पीसकर साग बनाओ।
या आलू संग इसे पकाओ।।

यकृत को ताकत यह देगी।
तन के सभी रोग हर लेगी।।


इसे लगाओ घर-आँगन में।
महक उगेगी यह उपवन में।।

अद्भुत है मेथी की माया।
करती यह निरोगी काया।।

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"टर्र-टर्र चिल्लाने वाला" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

>> 05 January, 2012


मेढक लाला बहुत निराला!

टर्र-टर्र चिल्लाने वाला!
मेढक लाला बहुत निराला!!
कभी कुमुद के नीचे छिपता,
और कभी ऊपर आ जाता,
जल-थल दोनों में ही रहता,
तभी उभयचर है कहलाता,
पल-पल रंग बदलने वाला!
मेढक लाला बहुत निराला!!
लगता है यह बहुत भयानक,
किन्तु बहुत है सीधा-सादा,
अगर जरा भी आहट होती,
झट से पानी में छिप जाता,
उभरी-उभरी आँखों वाला!
मेढक लाला बहुत निराला!!
मुण्डी बाहर करके अपनी,
इधर-उधर को झाँक रहा है,
कीट-पतंगो को खाने को,
देखो कैसा ताँक रहा है,
उछल-उछल कर चलने वाला!
मेढक लाला बहुत निराला!!
(छायांकनःडॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

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