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08 मार्च, 2017

बालगीत "होली का मौसम अब आया" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

रंग-गुलाल साथ में लाया।
होली का मौसम अब आया।
पिचकारी फिर से आई हैं,
बच्चों के मन को भाई हैं,
तन-मन में आनन्द समाया।
होली का मौसम अब आया।।
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गुझिया थाली में पसरी हैं,
पकवानों की महक भरी हैं, 
मठरी ने मन को ललचाया।
होली का मौसम अब आया।।
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बरफी की है शान निराली,
भरी हुई है पूरी थाली,
अम्मा जी ने इसे बनाया।
होली का मौसम अब आया।।
मम्मी बोली पहले खाओ,
उसके बाद खेलने जाओ,
सूरज ने मुखड़ा चमकाया।
होली का मौसम अब आया।

01 मार्च, 2017

बालकविता "झूम-झूमकर मच्छर आते" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

झूम-झूमकर मच्छर आते।
कानों में गुञ्जार सुनाते।।

नाम ईश का जपते-जपते।
सुबह-शाम को खूब निकलते।।
 
बैठा एक हमारे सिर पर।
खून चूसता है जी भर कर।।

नहीं यह बिल्कुल भी डरता।
लाल रक्त से टंकी भरता।।
 
कैसे मीठी निंदिया आये?
मक्खी-मच्छर नहीं सतायें।

मच्छरदानी को अपनाओ।
चैन-अमन से सोते जाओ।।

21 फ़रवरी, 2017

बालकविता "खेतों में शहतूत उगाओ"


कितना सुन्दर और सजीला।
खट्टा-मीठा और रसीला।।

हरे-सफेद, बैंगनी-काले।
छोटे-लम्बे और निराले।।

शीतलता को देने वाले।
हैं शहतूत बहुत गुण वाले।।

पारा जब दिन का बढ़ जाता।
तब शहतूत बहुत मन भाता।
 
इसका वृक्ष बहुत उपयोगी।
ठण्डी छाया बहुत निरोगी।।

टहनी-डण्ठल सब हैं बढ़िया।
इनसे बनती हैं टोकरियाँ।।
  रेशम के कीड़ों का पालन।
निर्धन को देता है यह धन।।

आँगन-बगिया में उपजाओ।
खेतों में शहतूत उगाओ।।

20 फ़रवरी, 2017

बालकविता "बच्चों का संसार निराला" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


सीधा-सादा. भोला-भाला।
बच्चों का संसार निराला।।

बचपन सबसे होता अच्छा।
बच्चों का मन होता सच्चा।

पल में रूठें, पल में मानें।
बैर-भाव को ये क्या जानें।।

प्यारे-प्यारे सहज-सलोने।
बच्चे तो हैं स्वयं खिलौने।।

बच्चों से होती है माता।
ममता से है माँ का नाता।।

बच्चों से है दुनियादारी।
बच्चों की महिमा है न्यारी।।

कोई बचपन को लौटा दो।
फिर से बालक मुझे बना दो।।

15 फ़रवरी, 2017

बालकविता "तीखी-मिर्च कभी मत खाओ" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

तीखी-तीखी और चर्परी।
हरी मिर्च थाली में पसरी।।

तोते इसे प्यार से खाते।
मिर्च देखकर खुश हो जाते।।

सब्ज़ी का यह स्वाद बढ़ाती।
किन्तु पेट में जलन मचाती।।

जो ज्यादा मिर्ची खाते हैं।
सुबह-सुबह वो पछताते हैं।।

दूध-दही बल देने वाले।
रोग लगाते, मिर्च-मसाले।।

शाक-दाल को घर में लाना।
थोड़ी मिर्ची डाल पकाना।।

तीखी-मिर्च कभी मत खाओ। 
सदा सुखी जीवन अपनाओ।।

13 फ़रवरी, 2017

बालकविता "सबके प्यारे बन जाओगे" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


मैं तुमको गुरगल कहता हूँ,
लेकिन तुम हो मैना जैसी।
तुम गाती हो कर्कश सुर में,
क्या मैना होती है ऐसी??


सुन्दर तन पाया है तुमने,
लेकिन बहुत घमण्डी हो।
नहीं जानती प्रीत-रीत को,
तुम चिड़िया उदण्डी हो।।

जल्दी-जल्दी कदम बढ़ाकर,
तुम आगे को बढ़ती हो।
अपनी सखी-सहेली से तुम,
सौतन जैसी लड़ती हो।।

भोली-भाली चिड़ियों को तुम,
लड़कर मार भगाती हो।
प्यारे-प्यारे कबूतरों को भी,
तुम बहुत सताती हो।।

मीठी बोली से ही तो,
मन का उपवन खिलता है।
अच्छे-अच्छे कामों से ही,
जग में यश मिलता है।।

बैर-भाव को तजकर ही तो,
अच्छे तुम कहलाओगे।
मधुर वचन बोलोगे तो,
सबके प्यारे बन जाओगे।।

10 फ़रवरी, 2017

बालकविता "क.ख.ग.घ. सिखलाऊँगी" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


चित्रांकन - कु. प्राची
मम्मी देखो मेरी डॉल।
खेल रही है यह तो बॉल।।

पढ़ना-लिखना इसे न आता।
खेल-खेलना बहुत सुहाता।।

कॉपी-पुस्तक इसे दिलाना।
विद्यालय में नाम लिखाना।।

मैं गुड़िया को रोज सवेरे।
लाड़ लड़ाऊँगी बहुतेरे।।

विद्यालय में ले जाऊँगी।
क.ख.ग.घ. सिखलाऊँगी।।

06 फ़रवरी, 2017

बालकविता "काँव-काँव कर चिल्लाया है कौआ" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

काले रंग का चतुर-चपल,
पंछी है सबसे न्यारा।
डाली पर बैठा कौओं का, 
जोड़ा कितना प्यारा।

नजर घुमाकर देख रहे ये,
कहाँ मिलेगा खाना।
जिसको खाकर कर्कश स्वर में,
छेड़ें राग पुराना।।

काँव-काँव का इनका गाना,
सबको नहीं सुहाता।
लेकिन बच्चों को कौओं का,
सुर है बहुत लुभाता।।

कोयलिया की कुहू-कुहू,
बच्चों को रास न आती।
कागा की प्यारी सी बोली, 
इनका मन बहलाती।।

देख इसे आँगन में,
शिशु ने बोला औआ-औआ।
खुश होकर के काँव-काँव कर,
चिल्लाया है कौआ।।

31 जनवरी, 2017

बालकविता "लगता एक तपस्वी जैसा" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


बगुला भगत बना है कैसा?
लगता एक तपस्वी जैसा।।

अपनी धुन में अड़ा हुआ है।
एक टाँग पर खड़ा हुआ है।।

धवल दूध सा उजला तन है।
जिसमें बसता काला मन है।।

मीनों के कुल का घाती है।
नेता जी का यह नाती है।।

बैठा यह तालाब किनारे।
छिपी मछलियाँ डर के मारे।।

पंखों को यह नोच रहा है।
आँख मूँद कर सोच रहा है।।

मछली अगर नजर आ जाये।
मार झपट्टा यह खा जाये।।

इसे देख धोखा मत खाना।
यह ढोंगी है जाना-माना।।


27 जनवरी, 2017

बालगीत "प्रकाश का पुंज हमारा सूरज" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


पूरब से जो उगता है और पश्चिम में छिप जाता है।
यह प्रकाश का पुंज हमारा सूरज कहलाता है।। 
रुकता नही कभी भी चलता रहता सदा नियम से, 
दुनिया को नियमित होने का पाठ पढ़ा जाता है। 
यह प्रकाश का पुंज हमारा सूरज कहलाता है।। 
नही किसी से भेद-भाव ये बैर कभी रखता है, 
सदा हितैषी रहने की शिक्षा हमको दे जाता है। 
यह प्रकाश का पुंज हमारा सूरज कहलाता है।। 
सूर्य उदय होने पर जीवों में जीवन आता है,
सबके लिए समानरूप से सुख की बारिश बरसाता है,
यह प्रकाश का पुंज हमारा सूरज कहलाता है।। 
दूर क्षितिज में रहकर तुम सबको जीवन देते हो, 
भुवन-भास्कर तुमको सब जग शीश नवाता है। 
यह प्रकाश का पुंज हमारा सूरज कहलाता है।।

24 जनवरी, 2017

बालकविता "क.ख.ग. लिखवाती हैं" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

रंग-बिरंगी पेंसिलें तो, 
हमको खूब लुभाती हैं। 
ये ही हमसे ए.बी.सी.डी., 
क.ख.ग. लिखवाती हैं।। 

रेखा-चित्र बनाना, 
इनके बिना असम्भव होता है।
कला बनाना भी तो, 
केवल इनसे सम्भव होता है।। 

गल्ती हो जाये तो,
लेकर रबड़ तुरन्त मिटा डालो।
गुणा-भाग करना चाहो तो,
बस्ते में से इसे निकालो।। 

छोटी हो या बड़ी क्लास,
ये काम सभी में आती है। 
इसे छीलते रहो कटर से, 
यह चलती ही जाती है।।
तख्ती,कलम,स्लेट का, 
तो इसने कर दिया सफाया है।
बदल गया है समय पुराना,
नया जमाना आया है।। 

22 जनवरी, 2017

बालकविता "नानी के घर जाना है" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


मई महीना आता है और, 
जब गर्मी बढ़ जाती है।
नानी जी के घर की मुझको, 
बेहद याद सताती है।।

तब मैं मम्मी से कहती हूँ, 
नानी के घर जाना है।
नानी के प्यारे हाथों से, 
आइसक्रीम भी  खाना है।।

कथा-कहानी मम्मी तुम तो, 
मुझको नही सुनाती हो।
नानी जैसे मीठे स्वर में, 
गीत कभी नही गाती हो।।

मेरी नानी मेरे संग में, 
दिन भर खेल खेलतीं है।
मेरी नादानी-शैतानी, 
हँस-हँस रोज झेलतीं हैं।।

मास-दिवस गिनती हैं नानी, 
आस लगाये रहती हैं।
प्राची-बिटिया को ले आओ, 
वो नाना से कहती हैं।।

21 जनवरी, 2017

बालगीत "मेरी प्यारी मुनिया" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

 
इतनी जल्दी क्या है बिटिया, 
सिर पर पल्लू लाने की।
अभी उम्र है गुड्डे-गुड़ियों के संग,
समय बिताने की।।


मम्मी-पापा तुम्हें देख कर,
मन ही मन हर्षाते हैं।
जब वो नन्ही सी बेटी की,
छवि आखों में पाते है।।

जब आयेगा समय सुहाना, 
देंगे हम उपहार तुम्हें।
तन मन धन से सब सौगातें, 
देंगे बारम्बार तुम्हें।।

दादी-बाबा की प्यारी, 
तुम सबकी राजदुलारी हो।
घर आंगन की बगिया की, 
तुम मनमोहक फुलवारी हो।।

सबकी आँखों में बसती हो, 
इस घर की तुम दुनिया हो।
प्राची तुम हो बड़ी सलोनी, 
मेरी प्यारी मुनिया हो।।

20 जनवरी, 2017

बालकविता "विद्यालय लगता है प्यारा" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


विद्या का भण्डार भरा है जिसमें सारा।
मुझको अपना विद्यालय लगता है प्यारा।।

नित्य नियम से विद्यालय में, मैं पढ़ने को जाता हूँ।
इण्टरवल जब हो जाता मैं टिफन खोल कर खाता हूँ।

खेल-खेल में दीदी जी विज्ञान गणित सिखलाती हैं।
हिन्दी और सामान्य-ज्ञान भी ढंग से हमें पढ़ाती हैं।।

कम्प्यूटर में सर जी हमको रोज लैब ले जाते है।
माउस और कर्सर का हमको सारा भेद बताते हैं।।

कम्प्यूटर में गेम खेलना सबसे ज्यादा भाता है।
इण्टरनेट चलाना भी मुझको थोड़ा सा आता है।।

जिनका घर है दूर वही बालक रिक्शा से आते हैं। 
जिनका घर है बहुत पास वो पैदल-पैदल जाते हैं।।

पढ़-लिख कर मैं अच्छे-अच्छे काम करूँगा।
दुनिया में अपने भारत का सबसे ऊँचा नाम करूँगा।
 

18 जनवरी, 2017

बालकविता (बालवाणी में मेरी बालकविता 'उल्लू')

"उल्लू"
उल्लू का रंग-रूप निराला।
लगता कितना भोला-भाला।।

अन्धकार इसके मन भाता।
सूरज इसको नही सुहाता।।

यह लक्ष्मी जी का वाहक है।
धन-दौलत का संग्राहक है।।

इसकी पूजा जो है करता।
ये उसकी मति को है हरता।।

धन का रोग लगा देता यह।
सुख की नींद भगा देता यह।।

सबको इसके बोल अखरते।
बड़े-बड़े इससे हैं डरते।।

विद्या का वैरी कहलाता।
ये बुद्धू का है जामाता।।

पढ़-लिख कर ज्ञानी बन जाना।
कभी न उल्लू तुम कहलाना।।

बालकविता "नौकर है यह बिना दाम का" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


यह कुत्ता है बड़ा शिकारी।
बिल्ली का दुश्मन है भारी।।

बन्दर अगर इसे दिख जाता।
भौंक-भौंक कर उसे भगाता।।

उछल-उछल कर दौड़ लगाता।
बॉल पकड़ कर जल्दी लाता।।

यह सीधा-सच्चा लगता है।
बच्चों को अच्छा लगता है।।

धवल दूध सा तन है सारा।
इसका नाम फिरंगी प्यारा।।

आँखें इसकी चमकीली हैं।
भूरी सी हैं और नीली हैं।।

जग जाता है यह आहट से।
साथ-साथ चल पड़ता झट से।।

प्यारा सा पिल्ला ले आना।
सुवह शाम इसको टहलाना।।

वफादार है बड़े काम का।
नौकर है यह बिना दाम का।।

17 जनवरी, 2017

बालकविता "अपना ऊँचा नाम करूँ" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


 
मैं अपनी मम्मी-पापा के,
नयनों का हूँ नन्हा-तारा। 
मुझको लाकर देते हैं वो,
रंग-बिरंगा सा गुब्बारा।।

मुझे कार में बैठाकर,
वो रोज घुमाने जाते हैं।
पापा जी मेरी खातिर,
कुछ नये खिलौने लाते हैं।। 


मैं जब चलता ठुमक-ठुमक,

वो फूले नही समाते हैं।
जग के स्वप्न सलोने,
उनकी आँखों में छा जाते हैं।। 


ममता की मूरत मम्मी-जी, 

पापा-जी प्यारे-प्यारे।
मेरे दादा-दादी जी भी,
हैं सारे जग से न्यारे।। 


सपनों में सबके ही,

सुख-संसार समाया रहता है।
हँसने-मुस्काने वाला,
परिवार समाया रहता है।। 


मुझको पाकर सबने पाली हैं,

नूतन अभिलाषाएँ।
क्या मैं पूरा कर कर पाऊँगा,
उनकी सारी आशाएँ।। 


मुझको दो वरदान प्रभू!

मैं अपना ऊँचा नाम करूँ।
मानवता के लिए जगत में,
अच्छे-अच्छे काम करूँ।।  


15 जनवरी, 2017

बालकविता "मीठा रस पीकर जीता है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

गुन-गुन करता भँवरा आया।
कलियों फूलों पर मंडराया।।

यह गुंजन करता उपवन में।
गीत सुनाता है कानन में।।

कितना काला इसका तन है।
किन्तु बड़ा ही उजला मन है।

जामुन जैसी शोभा न्यारी।
खुशबू इसको लगती प्यारी।।

यह फूलों का रस पीता है।
मीठा रस पीकर जीता है।।

13 जनवरी, 2017

बालकविता "गुब्बारों की महिमा न्यारी" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

बच्चों को लगते जो प्यारे।
वो कहलाते हैं गुब्बारे।।

गलियों, बाजारों, ठेलों में।
गुब्बारे बिकते मेलों में।।

काले, लाल, बैंगनी, पीले।
कुछ हैं हरे, बसन्ती, नीले।।

पापा थैली भर कर लाते।
जन्म-दिवस पर इन्हें सजाते।।

गलियों, बाजारों, ठेलों में।
गुब्बारे बिकते मेलों में।।

फूँक मार कर इन्हें फुलाओ।
हाथों में ले इन्हें झुलाओ।।

सजे हुए हैं कुछ दुकान में।
कुछ उड़ते हैं आसमान में।।

मोहक छवि लगती है प्यारी।
गुब्बारों की महिमा न्यारी।।