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28 अप्रैल, 2012

"सबका मन बहलाते हैं" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")


कभी झगड़ते हैं आपस में,
कभी दोस्त बन जाते हैं।
मन में मैल नहीं रखते जो,
वो बच्चे कहलाते हैं।।

तन से चंचल, भोले-भाले,
नित्य दिखाते खेल निराले,
किस्से-कथा-कहानी में जो,
जिज्ञासा दिखलाते हैं।
मन में मैल नहीं रखते जो,
वो बच्चे कहलाते हैं।।

कुत्ता-बिल्ली, गैया-बकरी,
चिड़िया अच्छी लगती है,
रोज नया कुछ करने की,
मन में अभिलाषा जगती है,
मीठी-मीठी बातों से ये,
सबका मन बहलाते हैं।
मन में मैल नहीं रखते जो,
वो बच्चे कहलाते हैं।।

बच्चे घर की हैं फुलवारी,
बच्चों की है शान निराली,
जाति-पाति और छुआ-छूत ये,
कभी नहीं अपनाते हैं।
मन में मैल नहीं रखते जो,
वो बच्चे कहलाते हैं।।