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29 मई, 2012

"गर्म जलेबी हमें खिलाओ" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


पापा मेले में ले जाओ।
गर्म जलेबी हमें खिलाओ।।
गोल-गोल हैं प्यारी-प्यारी।
शानदार हैं सबसे न्यारी।।
नारंगी रंगों वाली हैं।
लगती कानों की बाली हैं।।
कितनी अच्छी, कितनी सुन्दर?
मीठा रस है इनके अन्दर।।
मेले में थोडी ही खाना।
बाकी अपने घर ले जाना।।
गर्म दूध में इन्हें डुबाना।
ठण्डी हो जाने पर खाना।।

8 टिप्‍पणियां:

  1. meethee meethee jalebee dekh kar man lalcha gaya..methee methee jalebi..meethi methee rachna..sadar badhayee aaur amantran ke sath

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  2. वाह !! गरमागरम जलेबी... बढ़िया रस-भरी रचना.

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  3. प्यारी सी , मीठी मीठी सी जलेबी की कविता.....

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  4. रसदार जलेबी खाओ भैया |
    अच्छे दोस्त बनाओ भैया |

    सरस बने जीवन हम सबका-
    मधुर-स्वरों में गाओ भैया ||

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  5. पानी आ गया मुँह में
    वैसे नल में कम आ रहा है
    पानी खोलने वाला चौकीदार
    जलेबियाँ क्यों नहीं खा रहा है ।

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