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19 दिसंबर, 2010

"काँटों में भी मुस्काते हैं" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

काँटों में भी मुस्काते हैं।
सबके मन को बहलाते हैं।।
नागफनी की शैया पर भी,
ये हँसते-खिलते जाते हैं।
सबके मन को बहलाते हैं।। 
सुन्दर सुन्दर गुल गुलाब के,
सारा उपवन महकाते हैं।
सबके मन को बहलाते हैं।। 
नीम्बू की कण्टक शाखा पर,
सुरभित होकर बलखाते हैं। 
सबके मन को बहलाते हैं।।  
काँटों में भी मुस्काते हैं।
सबके मन को बहलाते हैं।।

6 टिप्‍पणियां:

  1. यही तो खूबी होती है काँटों मे भी जो मुस्कुरा दे समझिये जीना उसको आ गया।

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  2. बहुत सुन्दर शिक्षाप्रद कविता नानाजी .....आभार

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  3. फ़ूल बडे नाजुक होते हैं … कुछ ऐसी ही हैं आपकी ये लाईनें । अच्छी पोस्ट , शुभकामनाएं । पढ़िए "खबरों की दुनियाँ"

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