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15 जून, 2011

"वेबकैम की शान निराली" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")


वेबकैम पर हिन्दी में प्रकाशित 
"पहली बाल रचना"

 वेबकैम की शान निराली।
करता घर भर की रखवाली।।

दूर देश में छवि पहुँचाता।
यह जीवन्त बात करवाता।।

आँखें खोलो या फिर मींचो।
तरह-तरह की फोटो खींचो।

कम्प्यूटर में इसे लगाओ।
घर भर की वीडियो बनाओ।।

चित्रों से मन को बहलाओ।
खुद देखो सबको दिखलाओ।।

छोटा सा है प्यारा सा है।
बिल्कुल राजदुलारा सा है।।

मँहगा नहीं बहुत सस्ता है।
तस्वीरों का यह बस्ता है।।

नवयुग की यह है पहचान।
वेबकैम है बहुत महान।।

11 टिप्‍पणियां:

  1. सच में वेबकैम की शान निराली है...सुन्दर

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  2. सच में वेबकैम की महिमा न्यारी...

    जवाब देंहटाएं
  3. शास्त्री जी आपका बाल मन बेहद सुलभ प्रस्तुति प्रदान करता है बधाई

    जवाब देंहटाएं
  4. बहुत ही सुन्दर - मन को छूती बाल कविता .
    अपने में अनूठी और पहली भी .
    आप उत्तराखंड के बाल साहित्य को यों ही सम्रद्ध करें , यही कामना है .


    साभार

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  5. आपसे कोई विषय अछूता नहीं रहेगा ..सुन्दर प्रस्तुति

    जवाब देंहटाएं
  6. बाल साहित्य को समृद्ध करती बेहतरीन रचना।

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  7. सही कहा ...बेहतरीन गीत...

    जवाब देंहटाएं

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