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22 सितंबर, 2010

"अतिवृष्टि" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

अतिवृष्टि


जब सूखे थे खेत-बाग-वन,
तब रूठी थी बरखा-रानी।
अब बरसी तो इतनी बरसी,
घर में पानी, बाहर पानी।।


बारिश से सबके मन ऊबे,
धानों के बिरुए सब डूबे,
अब तो थम जाओ महारानी।
घर में पानी, बाहर पानी।।


दूकानों के द्वार बन्द हैं,
शिक्षा के आगार बन्द है,
राहें लगती हैं अनजानी।
घर में पानी, बाहर पानी।।


गैस बिना चूल्हा है सूना,
दूध बिना रोता है मुन्ना,
भूखी हैं दादी और नानी।
घर में पानी, बाहर पानी।।


बाढ़ हो गयी है दुखदायी,
नगर-गाँव में मची तबाही,
वर्षा क्या तुमने है ठानी।
घर में पानी, बाहर पानी।।

3 टिप्पणियाँ:

M VERMA २२ सितम्बर २०१० ७:३३ अपराह्न

अति हर चीज की अच्छी नहीं होती है और अब तो वर्षा की अति हो चुकी है
सुन्दर् रचना

रावेंद्रकुमार रवि २२ सितम्बर २०१० ८:०६ अपराह्न

गीत अच्छा है,
लेकिन अब तो यही मन हो रहा है
कि बरखा रानी फिर से कुछ दिनों के लिए रूठ जाएँ!

संगीता स्वरुप ( गीत ) २२ सितम्बर २०१० ८:२२ अपराह्न

इस बार की बारिश पर बिलकुल सटीक रचना ...अति हर चीज़ की बुरी होती है ..