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"भैंस हमारी सीधी-सादी" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

>> 26 February, 2011

सीधी-सादी, भोली-भाली।
लगती सुन्दर हमको काली।।

भैंस हमारी बहुत निराली।
खाकर करती रोज जुगाली।।

इसका बच्चा बहुत सलोना।
प्यारा सा है एक खिलौना।।

बाबा जी इसको टहलाते।
गर्मी में इसको नहलाते।।

गोबर रोज उठाती अम्मा।
सानी इसे खिलाती अम्मा।

गोबर की हम खाद बनाते।
खेतों में सोना उपजाते।।

भूसा-खल और चोकर खाती।
सुबह-शाम आवाज लगाती।।

कहती दूध निकालो आकर।
धन्य हुए हम इसको पाकर।।

6 comments:

रावेंद्रकुमार रवि 26 फरवरी 2011 9:24 pm  

यहाँ शुद्ध भैंस का ताज़ा दूध मिलता है!

डॉ॰ मोनिका शर्मा 26 फरवरी 2011 10:50 pm  

सुंदर कविता ....

चैतन्य शर्मा 27 फरवरी 2011 12:24 am  

सुन्दर है भैँस की कविता....

Deepak Saini 28 फरवरी 2011 10:51 am  

अच्छी कविता
मेरी बिटिया को बहुत अच्छी लगी
शुभकामनाये

अनुष्का 'ईवा' 1 मार्च 2011 8:48 am  

बहुत प्यारी कविता है नानाजी ....आभार

आचार्य परशुराम राय 5 मार्च 2011 9:46 am  

बाल जगत की सुरसरि धारा।
तट मयंक बहु भाँति उचारा।।
बाल-कविता सुन्दर लगी। आजकल बच्चों को हम भूल रहे हैं। आभार।

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