"भैंस हमारी सीधी-सादी" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
>> 26 February, 2011

सीधी-सादी, भोली-भाली।
लगती सुन्दर हमको काली।।
भैंस हमारी बहुत निराली।
खाकर करती रोज जुगाली।।
भैंस हमारी बहुत निराली।
खाकर करती रोज जुगाली।।
इसका बच्चा बहुत सलोना।
प्यारा सा है एक खिलौना।।
बाबा जी इसको टहलाते।
गर्मी में इसको नहलाते।।
गोबर रोज उठाती अम्मा।
सानी इसे खिलाती अम्मा।
गोबर की हम खाद बनाते।
खेतों में सोना उपजाते।।
भूसा-खल और चोकर खाती।
सुबह-शाम आवाज लगाती।।
कहती दूध निकालो आकर।
धन्य हुए हम इसको पाकर।।






6 comments:
यहाँ शुद्ध भैंस का ताज़ा दूध मिलता है!
सुंदर कविता ....
सुन्दर है भैँस की कविता....
अच्छी कविता
मेरी बिटिया को बहुत अच्छी लगी
शुभकामनाये
बहुत प्यारी कविता है नानाजी ....आभार
बाल जगत की सुरसरि धारा।
तट मयंक बहु भाँति उचारा।।
बाल-कविता सुन्दर लगी। आजकल बच्चों को हम भूल रहे हैं। आभार।
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