यह ब्लॉग खोजें

समर्थक

25 मार्च, 2011

"बिन ईंधन के चलती जाती" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

मेरी साईकिल
दो चक्कों की प्यारी-प्यारी।
आओ इस पर करें सवारी।।

साईकिल की शान निराली।
इसकी चाल बहुत मतवाली।।

बस्ते का यह भार उठाती।
मुझको विद्यालय पहुँचाती।।

पैडल मारो जोर लगाओ।
मस्त चाल से इसे चलाओ।।

सड़क देख कर खूब मचलती।
पगडण्डी पर सरपट चलती।

हटो-बचो मत शब्द पुकारो।
भीड़ देखकर घण्टी मारो।।

अच्छे अंक क्लास में लाओ।
छुट्टी में इसको टहलाओ।।

यह पैट्रोल नहीं है खाती।
बिन ईंधन के चलती जाती।।