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09 अप्रैल, 2011

"पतझड़ आज बसन्त हो गया" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")


एक साल के बाद हमारा,
लैपटॉप जीवन्त हो गया।
एकाकीपन की घड़ियों का,
अब लगता है अन्त हो गया।।
यह प्यारा सा संगी-साथी,
मेरा साथ निभाता है।
नये-नये चिट्ठाकारों से,
खुश होकर मिलवाता है।।
कलियुग की जीवन धारा में,
यह ज्ञानी और सन्त हो गया।
एकाकीपन की घड़ियों का,
अब लगता है अन्त हो गया।।
बहुत दिनों बीमार रहा यह,
दिल्ली जाकर स्वस्थ हो गया।
नई कुंजियों को पा करके,
पहले जैसा मस्त हो गया।
संजीवनी चबा कर फिर से,
बलशाली हनुमन्त हो गया।
एकाकीपन की घड़ियों का,
अब लगता है अन्त हो गया।।
बहुत दिनों के बाद तुम्हारा,
चित्र आज मैं खीँच रहा हूँ।
ब्लॉगिंग की केसर क्यारी को,
मित्र तुम्हीं से सींच रहा हूँ।
तुमको वापिस पा जाने से,
पतझड़ आज बसन्त हो गया।
एकाकीपन की घड़ियों का,
अब लगता है अन्त हो गया।।