मेरी बालकृति "नन्हें सुमन" से
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एक बालकविता
"लिखना-पढ़ना सिखला दो"![]()
भैया! मुझको भी,
लिखना-पढ़ना, सिखला दो।
क.ख.ग.घ, ए.बी.सी.डी,
गिनती भी बतला दो।।
पढ़ लिख कर मैं,
मम्मी-पापा जैसे काम करूँगी।
दुनिया भर में,
बापू जैसा अपना नाम करूँगी।।
रोज-सवेरे, साथ-तुम्हारे,
मैं भी उठा करूँगी।
पुस्तक लेकर पढ़ने में,
मैं संग में जुटा करूँगी।।
बस्ता लेकर विद्यालय में,
मुझको भी जाना है।
इण्टरवल में टिफन खोल कर,
खाना भी खाना है।।
छुट्टी में गुड़िया को,
ए.बी.सी.डी, सिखलाऊँगी।
उसके लिए पेंसिल और,
इक कापी भी लाऊँगी।।
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यह ब्लॉग खोजें
03 अगस्त, 2013
"लिखना-पढ़ना सिखला दो" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक.)
30 जुलाई, 2013
"तितली रानी" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक.)
मेरी बालकृति "नन्हें सुमन" से
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एक बालकविता
"तितली रानी"
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मन को बहुत लुभाने वाली,
तितली रानी कितनी सुन्दर।
भरा हुआ इसके पंखों में,
रंगों का है एक समन्दर।।
उपवन में मंडराती रहती,
फूलों का रस पी जाती है।
अपना मोहक रूप दिखाने,
यह मेरे घर भी आती है।।
भोली-भाली और सलोनी,
यह जब लगती है सुस्ताने।
इसे देख कर एक छिपकली,
आ जाती है इसको खाने।।
आहट पाते ही यह उड़ कर,
बैठ गयी चौखट के ऊपर।
मेरा मन भी ललचाया है,
मैं भी देखूँ इसको छूकर।।
इसके रंग-बिरंगे कपड़े,
होली की हैं याद दिलाते।
सजी धजी दुल्हन को पाकर,
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25 जुलाई, 2013
"भगवान एक है" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)
मेरी बालकृति "नन्हें सुमन" से
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एक बालकविता
"भगवान एक है"
मन्दिर, मस्जिद और
गुरूद्वारे।
भक्तों
को लगते हैं प्यारे।।
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हिन्दू
मन्दिर में हैं जाते।
देवताओं
को शीश नवाते।।
ईसाई
गिरजाघर जाते।
दीन-दलित
को गले लगाते।।
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अल्लाह
का फरमान जहाँ है।
मुस्लिम
का कुर-आन वहाँ है।।
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जहाँ
इमाम नमाज पढ़ाता।
मस्जिद
उसे पुकारा जाता।।
सिक्खों
को प्यारे गुरूद्वारे,
मत्था
वहाँ टिकाते सारे।।
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राहें
सबकी अलग-अलग हैं।
पर
सबके अरमान नेक है।
नाम
अलग हैं, पन्थ भिन्न हैं।
पर
जग में भगवान एक है।।
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21 जुलाई, 2013
"नन्हें सुमन की पहली रचना" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
मेरी बालकृति "नन्हें सुमन"
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की पहली रचना
वन्दना के रूप में
तान वीणा की सुनाओ कर रहे हम कामना।
माँ करो स्वीकार सुमनों की प्रबल
आराधना।।
अब ध्ररा पर ज्ञान की गंगा बहाओ,
तम मिटाकर सत्य के पथ को दिखाओ,
लक्ष्य में बाधक बना अज्ञान का जंगल
घना।
माँ करो स्वीकार सुमनों की प्रबल
आराधना।।
बेसुरे से राग में, अनुराग
भर दो,
फँस गये हैं हम भँवर में, पार कर
दो,
शारदे माँ कुमति हरकर सबको मेधावी बना।
माँ करो स्वीकार सुमनों की प्रबल
आराधना।।
वन्दना है आपसे, रसना में
रस की धार दो,
हम निपट अज्ञानियों को मातु निज आधार दो,
माँ हमें वरदान दो, होवें
सफल सब साधना।
माँ करो स्वीकार सुमनों की प्रबल
आराधना।।
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17 जुलाई, 2013
"‘नन्हे सुमन’ में प्रकाशित रचनाओं का शुभारम्भ" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)
06 मार्च, 2013
" प्राञ्जल की 14वीं वर्षगाँठ" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
कल मेरे पौत्र प्राञ्जल की
14वीं वर्षगाँठ थी! इस अवसर पर प्रिय प्राञ्जल को दिल की गहराइयों से शुभकामनाएँ और आशीर्वाद! -- रचा-बसा था उस समय, होली का त्यौहार। पौत्ररत्न के रूप में, मिला हमें उपहार।। -- जन्मदिवस पर आपको, देते हम आशीष। पढ़-लिखकर बन जाइए, जल्दी से वागीश।। ![]()
रोज सुबह सन्देश आपका, जब हमको मिल जाता है।
मन-उपवन का हर कोना, तब खिलकर मुस्काता है।।
जीवन कैसे जियें? यही सच्चे साथी सिखलाते हैं।
मर्म कर्म का हमें, हमारे शुभचिन्तक बतलाते हैं।
साथी पथ पर बढ़ने की जब सच्ची राह दिखाता है।
मन-उपवन का हर कोना, तब खिलकर मुस्काता है।।
दूर देश से आयी तितली, सोई कली जनाने को,
उठो सवेरा हुआ-समेटो उगते हुए खज़ाने को,
कलिकाओं को सुमन बनाने को, भँवरा मंडराता है।
मन-उपवन का हर कोना, तब खिलकर मुस्काता है।।
बाँटो प्यार सभी को, ये जीवन तो बहुत जरा सा है,
अमृत पाने की, सबके मन में होती अभिलाषा है,
लेकिन जिसने पिया गरल, वो महादेव कहलाता है।
मन-उपवन का हर कोना, तब खिलकर मुस्काता है।।
जब हम आते हैं दुनिया में, सभी बधायी देते हैं,
अनजानी सी मूरत में, हम बचपन को पा लेते हैं,
खुशियों का परिवेश, जगत में सबको बहुत सुहाता है।
मन-उपवन का हर कोना, तब खिलकर मुस्काता है।।
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01 जनवरी, 2013
" नया साल"
शुभ हो सबको यह नया साल!!
खाने को मिलता रहे माल!
स्वस्थ रहें नर और नारी,
सन्तान रहें आज्ञाकारी,
कचरा नहीं बीने कोई बाल!
शुभ हो सबको यह नया साल!!
♥ अब देखिए आज के चित्र पर कविता ♥
छील पेंसिल को मैंने इस कागज पर चिपकाया है।
देखो मम्मी मैंने कितना सुन्दर चित्र बनाया है।।
हरे रंग से पौधे में पत्तियाँ बनाई।
लाल रंग से इसमें कलियाँ बहुत सजाई।।
छीलन को चिपकाकर मोहक फूल खिलाए।
मेरी चित्रकला सबका मन बहुत लुभाए।।
सुमनो से बढ़कर दुनिया में कुछ नहीं होता।
इन्हें देखकर रोता बालक भी चुप होता।।
लिखना सदा सुलेख, मनोरम चित्र बनाना।
बैर-भाव को भूल सभी को मित्र बनाना।।
चित्रांकन-प्रांजल
14 नवंबर, 2012
"चाचा नेहरू को नमन" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
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जन्म जगत में पाया।
उसका जन्मदिवस भारत में
बाल दिवस कहलाया।।
मोती लाल पिता बैरिस्टर,
माता थी स्वरूप रानी।
छोड़ सभी आराम-ऐश को,
राह चुनी थी बेगानी।।
त्याग वकालत को नेहरू ने,
गांधी का पथ अपनाया।
उसका जन्मदिवस भारत में
बाल दिवस कहलाया।।
आजादी पाने की खातिर,
वीरों ने बलिदान दिया।
अमर सपूतों ने पग-पग पर ,
अपमानों का पान किया।
दमन चक्र से जो गोरों के,
कभी नहीं घबराया।
उसका जन्मदिवस भारत में
बाल दिवस कहलाया।।
दागे नहीं तोप से गोले,
ना बरछी तलवार उठायी।
सत्य-अहिंसा के बल पर,
खोई आजादी पायी।
अनशन करके, अंग्रेजों से,
शासन वापिस पाया।
उसका जन्मदिवस भारत में
बाल दिवस कहलाया।।
बच्चों को जो सदा प्यार से,
हँसकर गले लगाता था।
इसीलिए तो लाल जवाहर,
चाचा जी कहलाता था।
अपने जन्मदिवस को जिसने,
बालकदिवस बनाया।
उसका जन्मदिवस भारत में
बाल दिवस कहलाया।।
शासक था स्वदेश का पहला,
अपना प्यारा चाचा।
नवभारत के निर्माता का,
मन था सीधा-साचा।
उद्योगों का जिसने,
चौबिस घंटे चक्र चलाया।
उसका जन्मदिवस भारत में
बाल दिवस कहलाया।।
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10 नवंबर, 2012
“खों-खों करके बहुत डराता” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)
![]() दीपावली की शुभकामनाओं के साथ एक बाल कविता बिना सहारे और सीढ़ी के,झटपट पेड़ों पर चढ़ जाता। बच्चों और बड़ों को भी ये, खों-खों करके बहुत डराता। कोई इसको वानर कहता, कोई हनूमान बतलाता। मानव का पुरखा बन्दर है, यह विज्ञान हमें सिखलाता। गली-मुहल्ले, नगर गाँव में, इसे मदारी खूब नचाता। बच्चों को ये खूब हँसाता, पैसा माँग-माँग कर लाता। कुनबे भर का पेट पालता, लाठी से कितना घबराता। तान डुगडुगी की सुन करके, अपने करतब को दिखलाता। |
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