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05 मई, 2014

"सब्जी पर मँहगाई भारी" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मेरी बालकृति "नन्हें सुमन" से

 एक बालकविता
♥ ♥सब्जीमण्डी♥ ♥
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देखो-देखो सब्जी-मण्डी।
बिकते आलू,बैंगन,भिण्डी।।

कच्चे केले, पक्के केले।

मटर, टमाटर के हैं ठेले।।

गोभी,पालक,मिर्च हरी है।

धनिये से टोकरी भरी है।।

लौकी, तोरी और परबल हैं।

पीले-पीले सीताफल हैं।।

अचरज में है जनता सारी,

सब्जी पर महँगाई भारी।।

01 मई, 2014

♥ ♥ मन ख़ुशियों से फूला ♥ ♥ डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक"

मेरी बालकृति "नन्हें सुमन" से
 एक बालकविता
♥ ♥ मन ख़ुशियों से फूला ♥ ♥
उमस-भरा गरमी का मौसम,
तन से बहे पसीना!
कड़ी धूप में कैसे खेलूँ,
इसने सुख है छीना!!

कुल्फी बहुत सुहाती मुझको,
भाती है ठंडाई!
दूध गरम ना अच्छा लगता,
शीतल सुखद मलाई!!

पंखा झलकर हाथ थके जब,
मैंने झूला झूला!
ठंडी-ठंडी हवा लगी तब,
मन ख़ुशियों से फूला!!

♥ (चित्र में : प्राची) ♥

27 अप्रैल, 2014

"बाल कविता-तरबूज" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मेरी बालकृति "नन्हें सुमन" से
 एक बालकविता
"तरबूज"
 
जब गरमी की ऋतु आती है!
लू तन-मन को झुलसाती है!!

तब आता तरबूज सुहाना!
ठण्डक देता इसको खाना!!
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यह बाजारों में बिकते हैं!
फुटबॉलों जैसे दिखते हैं!!

एक रोज मन में यह ठाना!
देखें इनका ठौर-ठिकाना!!
 
पहुँचे जब हम नदी किनारे!
बेलों पर थे अजब नजारे!!

कुछ छोटे कुछ बहुत बड़े थे!
जहाँ-तहाँ तरबूज पड़े थे!!
 Watermelon field prachi
इनमें से था एक उठाया!
बैठ खेत में इसको खाया!!
 Watermelon
इसका गूदा लाल-लाल था!
ठण्डे रस का भरा माल था!!

19 अप्रैल, 2014

"मेरी गइया" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मेरी बालकृति "नन्हें सुमन" से
एक बालकविता 
"मेरी गइया"
मेरी गइया बहुत निराली।
सीधी-सादी, भोली-भाली।

सुबह हुई गइया रम्भाई,
मेरा दूध निकालो भाई।

हरी घास खाने को लाना,
उसमें भूसा नहीं मिलाना।

इसका बछड़ा बहुत सलोना,
प्यारा-सा वह एक खिलौना।

मैं जब गइया दुहने जाता,
वह "अम्माँ" कहकर चिल्लाता।

सारा दूध नहीं दुह लेना,
मुझको भी कुछ पीने देना।

थोड़ा ही ले जाना भइया,
सीधी-सादी मेरी मइया।

07 अप्रैल, 2014

"मीठा राग सुनाती हो" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मेरी बालकृति "नन्हें सुमन" से
"मीठा राग सुनाती हो"
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चिड़िया रानी फुदक-फुदक कर,
मीठा राग सुनाती हो।
आनन-फानन में उड़ करके,
आसमान तक जाती हो।।

मेरे अगर पंख होते तो,
मैं भी नभ तक हो आता।
पेड़ो के ऊपर जा करके,
ताजे-मीठे फल खाता।।

जब मन करता मैं उड़ कर के,
नानी जी के घर जाता।
आसमान में कलाबाजियाँ कर के,
सबको दिखलाता।।

सूरज उगने से पहले तुम,
नित्य-प्रति उठ जाती हो।
चीं-चीं, चूँ-चूँ वाले स्वर से ,
मुझको रोज जगाती हो।।

तुम मुझको सन्देशा देती,
रोज सवेरे उठा करो।
अपनी पुस्तक को ले करके,
पढ़ने में नित जुटा करो।।

चिड़िया रानी बड़ी सयानी,
कितनी मेहनत करती हो।
एक-एक दाना बीन-बीन कर,
पेट हमेशा भरती हो।।

अपने कामों से मेहनत का,
पथ हमको दिखलाती हो।।
जीवन श्रम के लिए बना है,
सीख यही सिखलाती हो।

03 अप्रैल, 2014

"लिखना-पढ़ना सिखला दो" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मेरी बालकृति "नन्हें सुमन" से
बालकविता
"लिखना-पढ़ना सिखला दो"
भैया! मुझको भी,
लिखना-पढ़ना, सिखला दो।
क.ख.ग.घ, ए.बी.सी.डी,
गिनती भी बतला दो।।

पढ़ लिख कर मैं,
मम्मी-पापा जैसे काम करूँगी।
दुनिया भर में,
बापू जैसा अपना नाम करूँगी।।

रोज-सवेरे, साथ-तुम्हारे,
मैं भी उठा करूँगी।
पुस्तक लेकर पढ़ने में,
मैं संग में जुटा करूँगी।।

बस्ता लेकर विद्यालय में,
मुझको भी जाना है।
इण्टरवल में टिफन खोल कर,
खाना भी खाना है।।

छुट्टी में गुड़िया को,
ए.बी.सी.डी, सिखलाऊँगी।
उसके लिए पेंसिल और,
इक कापी भी लाऊँगी।।

30 मार्च, 2014

"तितली रानी कितनी सुन्दर" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मेरी बालकृति "नन्हें सुमन" से
बालकविता
"तितली रानी कितनी सुन्दर"
मन को बहुत लुभाने वाली,
तितली रानी कितनी सुन्दर।
भरा हुआ इसके पंखों में,
रंगों का है एक समन्दर।।

उपवन में मंडराती रहती,
फूलों का रस पी जाती है।
अपना मोहक रूप दिखाने,
यह मेरे घर भी आती है।।

भोली-भाली और सलोनी,
यह जब लगती है सुस्ताने।
इसे देख कर एक छिपकली,
आ जाती है इसको खाने।।

आहट पाते ही यह उड़ कर,
बैठ गयी चौखट के ऊपर।
मेरा मन भी ललचाया है,
मैं भी देखूँ इसको छूकर।।

इसके रंग-बिरंगे कपड़े,
होली की हैं याद दिलाते।
सजी धजी दुल्हन को पाकर,
बच्चे फूले नही समाते।। 

26 मार्च, 2014

"नन्हे सुमन की वन्दना" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मेरी बालकृति "नन्हें सुमन" से
नन्हे सुमन की वन्दना
  
तान वीणा की सुनाओ कर रहे हम कामना।
माँ करो स्वीकार सुमनों की प्रबल आराधना।।

अब ध्ररा पर ज्ञान की गंगा बहाओ,
तम मिटाकर सत्य के पथ को दिखाओ,
लक्ष्य में बाधक बना अज्ञान का जंगल घना।
माँ करो स्वीकार सुमनों की प्रबल आराधना।।

बेसुरे से राग में, अनुराग भर दो,
फँस गये हैं हम भँवर में, पार कर दो,
शारदे माँ कुमति हरकर सबको मेधावी बना।
माँ करो स्वीकार सुमनों की प्रबल आराधना।।

वन्दना है आपसे, रसना में रस की धार दो,
हम निपट अज्ञानियों को मातु निज आधार दो,
माँ हमें वरदान दो, होवें सफल सब साधना।
माँ करो स्वीकार सुमनों की प्रबल आराधना।।

18 मार्च, 2014

"विद्यालय लगता है प्यारा" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मेरी बालकृति नन्हें सुमन से
बालकविता
विद्यालय लगता है प्यारा

विद्या का भण्डार भरा है जिसमें सारा।
मुझको अपना विद्यालय लगता है प्यारा।।

नित्य नियम से विद्यालय में, मैं पढ़ने को जाता हूँ।
इण्टरवल जब हो जाता मैं टिफन खोल कर खाता हूँ।

खेल-खेल में दीदी जी विज्ञान गणित सिखलाती हैं।
हिन्दी और सामान्य-ज्ञान भी ढंग से हमें पढ़ाती हैं।।

कम्प्यूटर में सर जी हमको रोज लैब ले जाते है।
माउस और कर्सर का हमको सारा भेद बताते हैं।।

कम्प्यूटर में गेम खेलना सबसे ज्यादा भाता है।
इण्टरनेट चलाना भी मुझको थोड़ा सा आता है।।

जिनका घर है दूर वही बालक रिक्शा से आते हैं। 
जिनका घर है बहुत पास वो पैदल-पैदल जाते हैं।।

पढ़-लिख कर मैं अच्छे-अच्छे काम करूँगा।
दुनिया में अपने भारत का सबसे ऊँचा नाम करूँगा।

14 मार्च, 2014

"नटखट प्राची" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मेरी बालकृति नन्हें सुमन से
बालकविता
"नटखट प्राची"
 
इतनी जल्दी क्या है बिटिया, 
सिर पर पल्लू लाने की।
अभी उम्र है गुड्डे-गुड़ियों के संग,
समय बिताने की।।
मम्मी-पापा तुम्हें देख कर,
मन ही मन हर्षाते हैं।
जब वो नन्ही सी बेटी की,
छवि आखों में पाते है।।

जब आयेगा समय सुहाना, 
देंगे हम उपहार तुम्हें।
तन मन धन से सब सौगातें, 
देंगे बारम्बार तुम्हें।।

दादी-बाबा की प्यारी, 
तुम सबकी राजदुलारी हो।
घर आंगन की बगिया की, 
तुम मनमोहक फुलवारी हो।।

सबकी आँखों में बसती हो, 
इस घर की तुम दुनिया हो।
प्राची तुम हो बड़ी सलोनी, 
इक प्यारी सी मुनिया हो।।