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13 जनवरी, 2017

बालकविता "गुब्बारों की महिमा न्यारी" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

बच्चों को लगते जो प्यारे।
वो कहलाते हैं गुब्बारे।।

गलियों, बाजारों, ठेलों में।
गुब्बारे बिकते मेलों में।।

काले, लाल, बैंगनी, पीले।
कुछ हैं हरे, बसन्ती, नीले।।

पापा थैली भर कर लाते।
जन्म-दिवस पर इन्हें सजाते।।

गलियों, बाजारों, ठेलों में।
गुब्बारे बिकते मेलों में।।

फूँक मार कर इन्हें फुलाओ।
हाथों में ले इन्हें झुलाओ।।

सजे हुए हैं कुछ दुकान में।
कुछ उड़ते हैं आसमान में।।

मोहक छवि लगती है प्यारी।
गुब्बारों की महिमा न्यारी।।



12 जनवरी, 2017

बालकविता "गैस सिलेण्डर" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

गैस सिलेण्डर कितना प्यारा।
मम्मी की आँखों का तारा।।

रेगूलेटर अच्छा लाना।
सही ढंग से इसे लगाना।।
  
गैस सिलेण्डर है वरदान।
यह रसोई-घर की है शान।।

दूघ पकाओ, चाय बनाओ।
मनचाहे पकवान बनाओ।।

बिजली अगर नही है घर में।
यह प्रकाश देता पल भर में।।

बाथरूम में इसे लगाओ।
गर्म-गर्म पानी से न्हाओ।।

बीत गया है वक्त पुराना।
अब आया है नया जमाना।।

जंगल से लकड़ी मत लाना।
बड़ा सहज है गैस जलाना।।

किन्तु सुरक्षा को अपनाना।
इसे कार में नही लगाना।

11 जनवरी, 2017

बालकविता "छोटा बस्ता हो आराम" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


मेरा बस्ता कितना भारी।
बोझ उठाना है लाचारी।।

मेरा तो नन्हा सा मन है।
छोटी बुद्धि दुर्बल तन है।।

पढ़नी पड़ती सारी पुस्तक।
थक जाता है मेरा मस्तक।।

रोज-रोज विद्यालय जाना।
बड़ा कठिन है भार उठाना।।


कम्प्यूटर का युग अब आया।
इसमें सारा ज्ञान समाया।।

मोटी पोथी सभी हटा दो।
बस्ते का अब भार घटा दो।।

थोड़ी कॉपी, पेन चाहिए।
हमको मन में चैन चाहिए।।

कम्प्यूटर जी पाठ पढ़ायें।
हम बच्चों का ज्ञान बढ़ाये।

इतने से चल जाये काम।
छोटा बस्ता हो आराम।।

10 जनवरी, 2017

बालकविता "सारा दूध नही दुह लेना" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


मेरी गैया बड़ी निराली,
 सीधी-सादी, भोली-भाली।
 सुबह हुई काली रम्भाई,
मेरा दूध निकालो भाई।
 हरी घास खाने को लाना,
उसमें भूसा नही मिलाना।
 उसका बछड़ा बड़ा सलोना,
वह प्यारा सा एक खिलौना।
  
मैं जब गाय दूहने जाता,
वह अम्मा कहकर चिल्लाता।
  
सारा दूध नही दुह लेना,
मुझको भी कुछ पीने देना।
 थोड़ा ही ले जाना भैया,
सीधी-सादी मेरी मैया।

09 जनवरी, 2017

बालकविता "तितली रानी कितनी सुन्दर" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

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मन को बहुत लुभाने वाली,
तितली रानी कितनी सुन्दर।
भरा हुआ इसके पंखों में,
रंगों का है एक समन्दर।।

उपवन में मंडराती रहती,
फूलों का रस पी जाती है।
अपना मोहक रूप दिखाने,
यह मेरे घर भी आती है।।

भोली-भाली और सलोनी,
यह जब लगती है सुस्ताने।
इसे देख कर एक छिपकली,
आ जाती है इसको खाने।।

आहट पाते ही यह उड़ कर,
बैठ गयी चौखट के ऊपर।
मेरा मन भी ललचाया है,
मैं भी देखूँ इसको छूकर।।

इसके रंग-बिरंगे कपड़े,
होली की हैं याद दिलाते।
सजी धजी दुल्हन को पाकर,
बच्चे फूले नही समाते।।

08 जनवरी, 2017

बालकविता "जीवन श्रम के लिए बना है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

बच्चों अर्थात् 

नन्हीं कलियों और सुमनों को समर्पित हैः 
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चिड़िया रानी फुदक-फुदक कर,
मीठा राग सुनाती हो।
आनन-फानन में उड़ करके,
आसमान तक जाती हो।।

मेरे अगर पंख होते तो,
मैं भी नभ तक हो आता।
पेड़ो के ऊपर जा करके,
ताजे-मीठे फल खाता।।

जब मन करता मैं उड़ कर के,
नानी जी के घर जाता।
आसमान में कलाबाजियाँ कर के,
सबको दिखलाता।।

सूरज उगने से पहले तुम,
नित्य-प्रति उठ जाती हो।
चीं-चीं, चूँ-चूँ वाले स्वर से ,
मुझको रोज जगाती हो।।

तुम मुझको सन्देशा देती,
रोज सवेरे उठा करो।
अपनी पुस्तक को ले करके,
पढ़ने में नित जुटा करो।।

चिड़िया रानी बड़ी सयानी,
कितनी मेहनत करती हो।
एक-एक दाना बीन-बीन कर,
पेट हमेशा भरती हो।।

अपने कामों से मेहनत का,
पथ हमको दिखलाती हो।।
जीवन श्रम के लिए बना है,
सीख यही सिखलाती हो।

07 जनवरी, 2017

वन्दना "बनें सब काज सुन्दर" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

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कह दिया मेरे सुमन ने आज सुन्दर।
तार वीणा के बजे बिन साज 
 सुन्दर ।।

ज्ञान की गंगा बही, विज्ञान पुलकित हो गया,
आकाश झंकृत हो गया, संसार हर्षित हो गया,
नाम से माँ के हुआ आगाज़ 
 सुन्दर 
तार वीणा के बजे बिन साज 
 सुन्दर ।।

बेसुरे से राग में, अनुराग भरने को चला हूँ,
मैं बिना पतवार, सरिता पार करने को चला हूँ,
माँ कृपा करदो, बनें सब काज 
 सुन्दर 
तार वीणा के बजे बिन साज 
 सुन्दर ।।

वन्दना है आपसे, रसना में माँ रस-धार दो,
लेखनी चलती रहे, शब्दो को माँ आधार दो,
असुर भागें, हो सुरो का राज 
 सुन्दर 
तार वीणा के बजे बिन साज 
 सुन्दर ।।

06 जनवरी, 2017

"पढ़ना-लिखना मजबूरी है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


मुश्किल हैं विज्ञान, गणित,
हिन्दी ने बहुत सताया है।
अंग्रेजी की देख जटिलता,
मेरा मन घबराया है।।  


भूगोल और इतिहास मुझे,
बिल्कुल भी नही सुहाते हैं।
श्लोकों के कठिन अर्थ,
मुझको करने नही आते हैं।। 


देखी नही किताब उठाकर,
खेल-कूद में समय गँवाया,
अब सिर पर आ गई परीक्षा,
माथा मेरा चकराया।। 


बिना पढ़े ही मुझको,
सारे प्रश्नपत्र हल करने हैं।
किस्से और कहानी से ही,
कागज-कॉपी भरने हैं।।


नाहक अपना समय गँवाया,
मैं यह खूब मानता हूँ।
स्वाद शून्य का चखना होगा,
मैं यह खूब जानता हूँ।।


तन्दरुस्ती के लिए खेलना,
सबको बहुत जरूरी है।
किन्तु परीक्षा की खातिर,
पढ़ना-लिखना मजबूरी है।।

14 नवंबर, 2015

"बाल-दिवस-पं. नेहरू को शत्-शत् नमन" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


राष्ट्र-नायक पं. नेहरू को शत्-शत् नमन!

चाचा नेहरू तुमने 

प्यारे बच्चों को ईनाम दिया था।
अपने जन्म-दिवस को 
तुमने बाल-दिवस का नाम दिया था।

फूलों की मुस्कानों से महके उपवन।
बच्चों की किलकारी से गूँजे आँगन।।

एक साल में एक बार ही बाल दिवस आता है।
मास नवम्बर नेहरू जी की हमको याद दिलाता है।।

लाल-जवाहर के सीने पर सजा सुमन है।
अभिनव भारत के निर्माता तुम्हें नमन है।।

14 अगस्त, 2015

बालकविता "प्रांजल-प्राची की नयी स्कूटी" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

आज हमारे लिए हमारे,
बाबा जी लाये स्कूटी।
वैसे तो काले रंग की है,
लेकिन लगती बीरबहूटी।।

इस प्यारी सी स्कूटी में,
खर्च नहीं बिल्कुल ईंधन का।
चार्ज करो इसको बिजली से,
संवाहक यह संसाधन का।।

अपने घर से विद्यालय की,
थोड़ी सी ज्यादा है दूरी।
पैदल-पैदल जाना पड़ता,
भारी बस्ता है मजबूरी।।

मेरा भइया स्कूटी को,
सीख रहा है अभी चलाना।
इसी सवारी से अब अपना,
विद्यालय को होगा जाना।।

मैं भी खुश हूँ, भइया भी खुश,
नयी सवारी को पा करके।
समय बचेगा, श्रम कम होगा,
पढ़ें-लिखेंगे हम जी भर के।।