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13 मई, 2010

“लीची के गुच्छे मन भाए!” (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

हरी, लाल और पीली-पीली!
बिकती लीची बहुत रसीली!!

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गुच्छा प्राची के मन भाया!
उसने उसको झट कब्जाया!!

IMG_1178 लीची को पकड़ा, दिखलाया!
भइया को उसने ललचाया!!

IMG_1179प्रांजल के भी मन में आया!
सोचा इसको जाए खाया!!

IMG_1180गरमी का मौसम आया है!
लीची के गुच्छे लाया है!!

IMG_1177दोनों ने गुच्छे लहराए!
लीची के गुच्छे मन भाए!!