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03 मई, 2011

“मन खुशियों से फूला” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

parrotउमस भरा गरमी का मौसम,
तन से बहे पसीना!
कड़ी धूप में कैसे खेलें,
इसने सुख है छीना!!


कुल्फी बहुत सुहाती हमको,
भाती है ठण्डाई!
दूध गरम ना अच्छा लगता,
शीतल सुखद मलाई!!
पंखा झलकर हाथ थके जब,
हमने झूला झूला!
ठण्डी-ठण्डी हवा लगी तब,
मन खुशियों से फूला!!  

14 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर बाल कविता..

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  2. गरमी के इस मौसम में
    प्राची को झूला झूलकर हवा खाते देखा,
    तो मन सचमुच ख़ुशियों से फूल उठा!

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  3. नमस्कार मयंक जी ..
    पहले तो सम्मान के लिये बहुत बहुत बधाई । आप जैसे कलम के धनी महानुभावो का आशीर्वाद की मुझे बहुत ही आवश्यकता है ।आप का मेरे ब्लांग मे आना मेरे लिये निश्चय ही उर्जा का काम करेगी ।
    धन्यवाद आभार सहित…..

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  4. बहुत सुन्दर बाल कविता.

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  5. aap to har cheez per kavita likhte hai ''aati sunder

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  6. ....प्यारी कविता .सम्मान के लिये बहुत बहुत बधाई .
    http://abhinavsrijan.blogspot.com/

    http://baalsahityalekhak.blogspot.com/

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  7. बहुत सुन्दर बाल कविता

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  8. aadarniy sir
    sach! garmi ke dino me ye hi sabhi cheeje man ko bhati hai chahe bachche ho ya bade.
    bahut bahut sundar laga aapka pyara sa bal-geet.
    hardik naman
    poonam

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  9. बाल-गीत लिखने में सिद्धहस्त हैं। अच्छी बाल कविता। साधुवाद।

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  10. ब्लॉग जगत में पहली बार एक ऐसा सामुदायिक ब्लॉग जो भारत के स्वाभिमान और हिन्दू स्वाभिमान को संकल्पित है, जो देशभक्त मुसलमानों का सम्मान करता है, पर बाबर और लादेन द्वारा रचित इस्लाम की हिंसा का खुलकर विरोध करता है. साथ ही धर्मनिरपेक्षता के नाम पर कायरता दिखाने वाले हिन्दुओ का भी विरोध करता है.
    इस ब्लॉग पर आने से हिंदुत्व का विरोध करने वाले कट्टर मुसलमान और धर्मनिरपेक्ष { कायर} हिन्दू भी परहेज करे.
    समय मिले तो इस ब्लॉग को देखकर अपने विचार अवश्य दे
    .
    जानिए क्या है धर्मनिरपेक्षता
    हल्ला बोल के नियम व् शर्तें

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