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05 जनवरी, 2012

"टर्र-टर्र चिल्लाने वाला" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")


मेढक लाला बहुत निराला!

टर्र-टर्र चिल्लाने वाला!
मेढक लाला बहुत निराला!!
कभी कुमुद के नीचे छिपता,
और कभी ऊपर आ जाता,
जल-थल दोनों में ही रहता,
तभी उभयचर है कहलाता,
पल-पल रंग बदलने वाला!
मेढक लाला बहुत निराला!!
लगता है यह बहुत भयानक,
किन्तु बहुत है सीधा-सादा,
अगर जरा भी आहट होती,
झट से पानी में छिप जाता,
उभरी-उभरी आँखों वाला!
मेढक लाला बहुत निराला!!
मुण्डी बाहर करके अपनी,
इधर-उधर को झाँक रहा है,
कीट-पतंगो को खाने को,
देखो कैसा ताँक रहा है,
उछल-उछल कर चलने वाला!
मेढक लाला बहुत निराला!!
(छायांकनःडॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

21 दिसंबर, 2011

"वर्षा आई" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")



शीतल पवन चली सुखदायी।
रिम-झिमरिम-झिम वर्षा आई।
भीग रहे हैं पेड़ों के तन,
भीग रहे हैं आँगन उपवन,
हरियाली सबके मन भाई।
रिम-झिमरिम-झिम वर्षा आई।।

मेंढक टर्र-टर्र चिल्लाते,
झींगुर मस्ती में हैं गाते,
आमों की बहार ले आई।
रिम-झिमरिम-झिम वर्षा आई।।

आसमान में बिजली कड़की,
डर से सहमें लडका-लड़की,
बन्दर जी की शामत आई।
रिम-झिमरिम-झिम वर्षा आई।।

कहीं छाँव हैकहीं धूप है,
इन्द्रधनुष कितना अनूप है,
धरती ने है प्यास बुझाई।
रिम-झिमरिम-झिम वर्षा आई।।

कल विद्यालय भी जाना है,
होम-वर्क भी जँचवाना है,
मुन्नी कॉपी लेकर आयी।
रिम-झिमरिम-झिम वर्षा आई।।

29 नवंबर, 2011

‘‘तीखी-मिर्च सदा कम खाओ’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

तीखी-तीखी और चर्परी।
हरी मिर्च थाली में पसरी।।

तोते इसे प्यार से खाते।
मिर्च देखकर खुश हो जाते।।

सब्ज़ी का यह स्वाद बढ़ाती।
किन्तु पेट में जलन मचाती।।

जो ज्यादा मिर्ची खाते हैं।
सुबह-सुबह वो पछताते हैं।।

दूध-दही बल देने वाले।
रोग लगाते, मिर्च-मसाले।

शाक-दाल को घर में लाना।
थोड़ी मिर्ची डाल पकाना।।

सदा सुखी जीवन अपनाओ।
तीखी-मिर्च सदा कम खाओ।।

22 नवंबर, 2011

"बेटी कुदरत का उपहार" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")


बिटियारानी कितनी प्यारी।
घर भर की है राजकुमारी।।

भोली-भाली सौम्य-सरल है।
कलियों जैसी यह कोमल है।।

देवी जैसी पावन सूरत।
ममता की है जीवित मूरत।।

बेटी कुदरत का उपहार।
आओ इसको करें दुलार।।

18 नवंबर, 2011

"लौकी होती गुणकारी है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

लौकी होती गुणकारी है।
बीमारी इससे हारी है।।

रोज हाट से लौकी लाओ।
छीलो-काटो और पकाओ।।

सब्ज़ी या रायता बनाओ।
रोटी-पूड़ी के संग खाओ।।

चाहे इसका जूस निकालो।
थोड़ा काला नमक मिलालो।।

रोज सवेरे यह रस पी लो।
आनन्दित हो जीवन जी लो।।

यह रसायन हितकारी है।
इसीलिए लौकी प्यारी है।।

03 नवंबर, 2011

"खीरा होता है गुणकारी" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

सूरत इसकी कितनी प्यारी।
खीरा होता है गुणकारी।।

हरा-भरा है और मुलायम।
सबका मोह रहा है यह मन।।

छीलो-काटो नमक लगा लो।
नींबू का थोड़ा रस डालो।।

भूख बढ़ाता, गैस हटाता।
बीमारी को दूर भगाता।।

चाहे तो रायता बनाओ।
या इसको सलाद में खाओ।।

अपने मुँह का स्वाद बढ़ाओ।
नित्य-नियम से घर में लाओ।।

23 अक्टूबर, 2011

"इससे साफ नज़र आता है" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")


जो सबके मन को भाता है।
वो ही चश्मा कहलाता है।।
 
आयु जब है बढ़ती जाती।
जोत आँख की घटती जाती।।
 
जब हो पढ़ने में कठिनाई।
ऐनक होती है सुखदाई।।
 
इससे साफ नज़र आता है।
लिखना-पढ़ना हो जाता है।।
 
जब सूरज है ताप दिखाता।
चश्मा बहुत याद तब आता।।
 
तेज धूप से यह बचाता।
आँखों को ठण्डक पहुँचाता।।

14 अक्टूबर, 2011

"मकड़ी-मकड़े" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

मित्रों! आज प्रांजल-प्राची ने माँग रखी कि
बाबा जी मकड़ी पर लिखिए न!
उन्हीं की माँगपर प्रस्तुत है यह बालकविता!

कीट-पतंगे, मच्छर-मक्खी,
कच्चे जालों में जकड़े।
उनको ही तो कहती दुनिया,
आठ टाँग के मकड़ी-मकड़े।।

जाल बुना करते ये हरदम
झाड़ी और दीवारों पर।
और दौड़ते रहते हैं ये,
इन महीन से तारों पर।।

कभी यह ऊपर को चढ़ते,
कभी फिसल नीचे आ जाते।
किन्तु निरन्तर कोशिश करते,
श्रम से कभी नहीं घबड़ाते।।

अपने पथ को निर्मित करते,
देखो इन यजमानों को।
करते रहते हैं ये प्रेरित,
जग में सब इन्सानों को।

एक बार हो गये विफल तो,
अगली बार सफल होंगे।
यदि होंगे मजबूत इरादे,
कभी नहीं असफल होंगे।।

12 अक्टूबर, 2011

"ककड़ी मोह रही सबका मन" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")


लम्बी-लम्बी हरी मुलायम।
ककड़ी मोह रही सबका मन।।
कुछ होती हल्के रंगों की,
कुछ होती हैं बहुरंगी सी,
कुछ होती हैं सीधी सच्ची,
कुछ तिरछी हैं बेढंगी सी,
ककड़ी खाने से हो जाता,
शीतल-शीतल मन का उपवन।
ककड़ी मोह रही सबका मन।।
नदी किनारे पालेजों में, 
ककड़ी लदी हुईं बेलों पर,
ककड़ी बिकतीं हैं मेलों में,
हाट-गाँव में, फड़-ठेलों पर,
यह रोगों को दूर भगाती,
यह मौसम का फल है अनुपम।
ककड़ी मोह रही सबका मन।।
आता है जब मई महीना,
गर्म-गर्म जब लू चलती हैं,
तापमान दिन का बढ़ जाता,
गर्मी से धरती जलती है,
ऐसे मौसम में सबका ही,
ककड़ी खाने को करता मन।
ककड़ी मोह रही सबका मन।।