कविता : आधी आजादी
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आधी आजादी
हो गई है देश की आजादी ,
छा गया है फिर से अन्धेरा....
सोचा था कि कुछ पल कुछ दिन जी लूँ ,
करू रात को दिन जैसा उजियारा .....
पर चोर और बदमाश नेताओ...
5 घंटे पहले
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9 comments:
सरल, सहज रूप में यथार्थ को अभिव्यक्त करती सशक्त व सार्थक रचना।
sahi kaha kuch becharon ko petki khatir bhagwaan bhi bechne padte hain...
nice poem
Ati sundar, shashtriji
बेच रहा मैं भगवानों को!
खोज रहा हूँ श्रीमानों को!!
क्या कहें ………सब कुछ सम्भव है…………सुन्दर रचना।
अच्छी है!
नमस्ते,
आपका बलोग पढकर अच्चा लगा । आपके चिट्ठों को इंडलि में शामिल करने से अन्य कयी चिट्ठाकारों के सम्पर्क में आने की सम्भावना ज़्यादा हैं । एक बार इंडलि देखने से आपको भी यकीन हो जायेगा ।
सुन्दर और सटीक रचना...
बेच रहा मैं भगवानों को!
खोज रहा हूँ श्रीमानों को!!
कोई भगवान भी नहीं खरीदता ...
मनभावन होने के कारण
"सरस पायस" पर हुई "सरस चर्चा" में
इन्हें देख मन गाने लगता!
शीर्षक के अंतर्गत
इस पोस्ट की चर्चा की गई है!
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