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17 जून, 2010

"माँ!" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

imageमाता के उपकार बहुत,
वो भाषा हमें बताती है!
उँगली पकड़ हमारी माता,
चलना हमें सिखाती है!!


दुनिया में अस्तित्व हमारा,
माँ के ही तो कारण है,
खुद गीले में सोती वो,
सूखे में हमें सुलाती है!
उँगली पकड़ हमारी……..


देश-काल चाहे जो भी हो,
माँ ममता की मूरत है,
धोकर वो मल-मूत्र हमारा,
पावन हमें बनाती है!
उँगली पकड़ हमारी……..


पुत्र कुपुत्र भले बन जायें,
होती नही कुमाता माँ,
अपने हिस्से की रोटी,
पुत्रों को सदा खिलाती  है!
उँगली पकड़ हमारी……..


ऋण नही कभी चुका सकता,
कोई भी जननी माता का,
माँ का आदर करो सदा,
यह रचना यही सिखाती है!
उँगली पकड़ हमारी……..