यह ब्लॉग खोजें

समर्थक

25 जून, 2010

“भोजन सदा खिलाना!” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

IMG_1523
रबड़ प्लाण्ट का वृक्ष लगा है,
मेरे घर के आगे!
पत्ते खाने बकरे-बकरी,
आये भागे-भागे!

हुए बहुत मायूस,
धरा पर पर पत्ता कोई न पाया!
इन्हे उदास देखकर मैंने,
अपना हाथ बढ़ाया!!


झटपट पत्ता तोड़ पेड़ से,
हाथों में लहराया!
इन भोले-भाले जीवों का,
मन था अब ललचाया!!
IMG_1515आँखों में आशा लेकर,
सब मेरे पास चले आये!

चक-उचककर बड़े चाव से
सबने पत्ते खाये!!
IMG_1519 दुनिया के जीवों का,
यदि तुम प्यार चाहते पाना!
भूखों को सच्चे मन से
तुम भोजन सदा खिलाना!!



अब इस बाल-कविता को सुनिए-
अर्चना चावजी के स्वर में-