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03 जुलाई, 2010

‘‘… ..बादल बरस रहे हैं?’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

गरज रहे हैं, लरज रहे हैं,
काले बादल बरस रहे हैं।

 कल तक तो सूखा-सूखा था,
धरती का तन-मन रूखा था,
आज झमा-झम बरस रहे हैं।
काले बादल बरस रहे हैं।।

IMG_1631भीग रहे हैं आँगन-उपवन,
तृप्त हो रहे खेत, बाग, वन,
उमड़-घुमड़ घन बरस रहे हैं।
काले बादल बरस रहे हैं।।
मुन्ना भीगा, मुन्नी भीगी,
गोरी की है चुन्नी भीगी,
जोर-शोर से बरस रहे हैं।
काले बादल बरस रहे हैं।।

श्याम घटाएँ घिर-घिर आयी, 
रिम-झिम की बजती शहनाई,
जी भर कर अब बरस रहे हैं।
काले बादल बरस रहे हैं।।