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15 जुलाई, 2010

“नाच रहा जंगल में मोर” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

देख-देख मन हुआ विभोर।
नाच रहा जंगल में मोर।।
चंचल-चपला चमक रही है,
बादल गरज रहा घनघोर।
नाच रहा जंगल में मोर।।
रूप सलोना देख मोरनी,
के मन में है हर्ष-हिलोर।
नाच रहा जंगल में मोर।।


नीलकण्ठ का नृत्य हो रहा,
पुरवा मचा रही है शोर।
नाच रहा जंगल में मोर।।
रंग-बिरंगा और मनभावन,
कितना अच्छा लगता मोर।
नाच रहा जंगल में मोर।।


इस गीत को स्वर दिया है! अर्चना चावजी ने!