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17 जुलाई, 2010

‘‘... .. .वर्षा आई’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

रिम-झिम, रिम-झिम वर्षा आई।

शीतल पवन चली सुखदायी।
रिम-झिम, रिम-झिम वर्षा आई।

भीग रहे हैं पेड़ों के तन,
भीग रहे हैं आँगन उपवन,
हरियाली सबके मन भाई।
रिम-झिम, रिम-झिम वर्षा आई।।

मेंढक टर्र-टर्र चिल्लाते,
झींगुर मस्ती में हैं गाते,
आमों की बहार ले आई।
रिम-झिम, रिम-झिम वर्षा आई।।

आसमान में बिजली कड़की,
डर से सहमें लडका-लड़की,
बन्दर जी की शामत आई।
रिम-झिम, रिम-झिम वर्षा आई।।
 
कहीं छाँव है, कहीं धूप है,
इन्द्रधनुष कितना अनूप है,
धरती ने है प्यास बुझाई।
रिम-झिम, रिम-झिम वर्षा आई।।
 
विद्यालय भी तो जाना है,
होम-वर्क भी जँचवाना है,
प्राची छाता लेकर आयी।
रिम-झिम, रिम-झिम वर्षा आई।।