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21 जुलाई, 2010

“मेरा झूला” (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

मेरा झूला बडा़ निराला!

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मम्मी जी ने इसको डाला।
मेरा झूला बडा़ निराला।।


खुश हो जाती हूँ मैं कितनी,
जब झूला पा जाती हूँ।
होम-वर्क पूरा करते ही,
मैं इस पर आ जाती हूँ।
करता है मन को मतवाला।
मेरा झूला बडा़ निराला।।


मुझको हँसता देख,
सभी खुश हो जाते हैं।
बाबा-दादी, प्यारे-प्यारे,
नये खिलौने लाते हैं।
आओ झूलो, मुन्नी-माला।
मेरा झूला बडा़ निराला।।