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04 सितंबर, 2013

"भँवरा" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

मेरी बालकृति "नन्हें सुमन" से
एक बालकविता"भँवरा"

गुन-गुन करता भँवरा आया।
कलियों फूलों पर मंडराया।।

यह गुंजन करता उपवन में।
गीत सुनाता है गुंजन में।।

कितना काला इसका तन है।
किन्तु बड़ा ही उजला मन है।

जामुन जैसी शोभा न्यारी।
खुशबू इसको लगती प्यारी।।

यह फूलों का रस पीता है।
मीठा रस पीकर जीता है।।

5 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 05-09-2013 के चर्चा मंच पर है
    कृपया पधारें
    धन्यवाद

    उत्तर देंहटाएं
  2. कितना काला इसका तन है।
    किन्तु बड़ा ही उजला मन है।

    सुंदर मनभावन ..

    उत्तर देंहटाएं
  3. वाह .शिक्षक दिवस की हार्दिक शुभकामना

    उत्तर देंहटाएं
  4. आपके ब्लॉग को ब्लॉग एग्रीगेटर "ब्लॉग - चिठ्ठा" में शामिल किया गया है। सादर …. आभार।।

    कृपया "ब्लॉग - चिठ्ठा" के फेसबुक पेज को भी लाइक करें :- ब्लॉग - चिठ्ठा

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