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01 जनवरी, 2014

"स्वरावलि" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मेरी बालकृति नन्हें सुमन से
 
"स्वरावलि"
‘‘‘’
‘‘‘’ से अल्पज्ञ सबओम् सर्वज्ञ है।
ओम् का जापसबसे बड़ा यज्ञ है।।

‘‘’’
‘‘’’ से आदि न जिसकाकोई अन्त है।
सारी दुनिया का आराध्यवह सन्त है।।

‘‘’’
‘‘’’ से इमली खटाई भरीखान है।
खट्टा होना खतरनाकपहचान है।।

‘‘’’
‘‘’’ से ईश्वर का जिसकोसदा ध्यान है।
सबसे अच्छा वहीनेक इन्सान है।।

‘‘’’
उल्लू बन कर निशाचरकहाना नही।
अपना उपनाम भी यह धराना नही।।

‘‘’’
ऊँट का ऊँट बनपग बढ़ाना नही।
ऊँट को पर्वतों परचढ़ाना नही।।

‘‘’’
‘‘’’ से हैं वह ऋषिजो सुधारे जगत।
अन्यथा जान लोउसको ढोंगी भगत।।

‘‘’’
‘‘’’ से है एकता मेंभला देश का।
एकता मन्त्र हैशान्त परिवेश का।।

‘‘’’
‘‘’’ से तुम ऐठना मतकिसी से कभी।
हिन्द के वासियोंमिल के रहना सभी।।

‘‘’’
‘‘’’ से बुझती नहीप्यास है ओस से।
सारे धन शून्य हैएक सन्तोष से।।

‘‘’’
‘‘’’ से औरों को पथउन्नति का दिखा।
हो सके तो मनुजताजगत को सिखा।।

‘‘अं’’
‘‘अं’’ से अन्याय सहनामहा पाप है।
राम का नाम जपनाबड़ा जाप है।।

‘‘अः’’
‘‘अः’’ के आगे का स्वर,अब बचा ही नही।
इसलिएआगे कुछ भी रचा ही नही।।