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14 मार्च, 2011

"मैं हूँ आप सबकी प्यारी प्राची"


आज 14 मार्च है!
यानि मेरी 6वीं वर्षगाँठ!
इस अवसर पर मेरे परिवार ने मिलकर
भारतीय संस्कृति के अनुसार
मेरा जन्मदिवस मनाया!
सबसे पहले आम के लट्ठे को छीलकर
यज्ञ करने के लिए समिधाएँ बनाई गईं!
अब बाबा जी ने हवन किया! 
यज्ञ के पश्चात मैंने हाथ जोड़कर
सबको अभिवादन किया!
इस अवसर पर मेरे बहुत से दोस्त भी आये थे!
उनको मैंने जलपान भी कराया!
आधुनिकता में भी मैं किसी से कम नहीं हूँ!
मैंने भी मिल्क-केक काटा!
सबसे पहले मेरे बड़े दादा जी ने मुझे आशीर्वाद दिया!
अब बड़ी दादी जी ने मुझको तिलक किया!
मेरे प्यारे बाबा जी ने मुझे ढेर सारा प्यार करते हुए,
अपना आशीर्वाद दिया!
मेरी दादी मुझे बहुत प्यार करतीं हैं।
उन्होंने भी गिफ्ट दिया!
मेरे पापा सबसे अच्छे है!
उन्होंने भी मेरा मंगल तिलक किया!
और मम्मी जी ने भी मुझे तिलक लगाया!
 मेरे प्यारे चाचा तो मुझे सबसे ज्यादा प्यार करते है!
उन्होंने मुझे सबसे बढ़िया गिफ्ट दिया!
इस प्रकार मेरा जन्मदिन 
सबने बहुत हर्ष और उल्लास के साथ मनाया!
मैं हूँ आप सबकी प्यारी कु. प्राची

"जन्मदिन की बधाई" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

आज मेरा जन्म-दिवस है!
आज तुम्हारी वर्षगाँठ को,
मिल कर सभी मनायेंगे।
जन्मदिवस पर प्यारी बिटिया को,
हम बहुत सजाएँगे।।

मम्मी-पापा हर्षित होकर,
लायेंगे उपहार बहुत,
जो तुमको अच्छे लगते हैं,
वस्त्र वही दिलवायेंगे।

होली की पिचकारी के संग,
रंग सलोने भी होंगे,
गुब्बारे और खेल-खिलोने,
सुन्दर-सुन्दर लाएँगे।।

इष्ट-मित्र और सम्बन्धी भी,
देंगे शुभ-आषीष तुम्हें,
इस पावन वेला पर घर में,
यज्ञ-हवन करवायेंगे।

दादा-दादी की बगिया की,
तुम ही तो फुलवारी हो,
खुशी-खुशी प्यारी प्राची को,
हँस कर गले लगायेंगे।
--
मेरी पिछली वर्ष मनाई गई
सालगिरह के कुछ चित्र
बड़े दादा-दादी जी,
मेरे नन्हें दोस्त
और मेरा पूरा परिवार
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मम्मी बैठीं है, पापा गुब्बारा फुला रहे हैं!
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पापा मंगल तिलक लगा रहें हैं
और भइया प्रांजल साथ में खड़े हैं!
दादी मोबाइल कान में लगाएँ हैं
और बाबा जी आशीर्वाद दे रहे हैं!
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विनीत चाचा जी ने तो मुझे
प्यार से गोद में ही उठा लिया है!
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पीछे मेरी परदादी हैं और बनबसा से
मेरे ताऊ जी आये हैं!
मैं कितनी खुश हूँ न आज!

12 मार्च, 2011

"मुझको पतंग बहुत भाती है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")


नभ में उड़ती इठलाती है।
मुझको पतंग बहुत भाती है।।

रंग-बिरंगी चिड़िया जैसी,
लहर-लहर लहराती है।।

कलाबाजियाँ करती है जब,
मुझको बहुत लुभाती है।।

इसे देखकर मुन्नी-माला,
फूली नहीं समाती है।।

पाकर कोई सहेली अपनी,
दाँव-पेंच दिखलाती है।।

मुझको बहुत कष्ट होता है।
जब पतंग कट जाती है।।

10 मार्च, 2011

"होली का मौसम अब आया" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

रंग-गुलाल साथ में लाया।
होली का मौसम अब आया।
पिचकारी फिर से आई हैं,
बच्चों के मन को भाई हैं,
तन-मन में आनन्द समाया।
होली का मौसम अब आया।।
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गुझिया थाली में पसरी हैं,
पकवानों की महक भरी हैं, 
मठरी ने मन को ललचाया।
होली का मौसम अब आया।।
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बरफी की है शान निराली,
भरी हुई है पूरी थाली,
अम्मा जी ने इसे बनाया।
होली का मौसम अब आया।।
मम्मी बोली पहले खाओ,
उसके बाद खेलने जाओ,
सूरज ने मुखड़ा चमकाया।
होली का मौसम अब आया।

05 मार्च, 2011

"मन का आँगन है महका" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")


 

5 मार्च को इस बगिया में, सुमन खिला है प्यारा।
किलकारी से गूँजा फिर से, सूना भवन हमारा।।



उपवन में छा गई बहारें, रंग बसन्ती चहका,
निश्छल प्यारी बातों से, मन का आँगन है महका,
कुल दीपक आया है घर में, बन करके ध्रुव तारा।
किलकारी से गूँजा फिर से, सूना भवन हमारा।।



नीरस जीवन सरस हुआ है, अच्छी लगती दुनिया,
कुछ वर्षों के बाद, हमारे घर में आयी मुनिया,
प्रांजल-प्राची के आने से, दूर हुआ दुख सारा।
किलकारी से गूँजा फिर से, सूना भवन हमारा।।



छोटे-बड़े सभी उत्सव, हम इनके साथ मनाते हैं
बच्चों के संग में रह कर,हम भी बच्चे बन जाते हैं,
सुख का सूरज लेकर आया, है जग में उजियारा।
किलकारी से गूँजा फिर से, सूना भवन हमारा।।



जन्मदिवस पर तुम्हें कीमती, देता हूँ सौगातें,
घर के बड़े-बुजुर्गों की, तुम सदा मानना बातें,
माता-पिता, गुरू का आदर करना धर्म तुम्हारा। 
किलकारी से गूँजा फिर से, सूना भवन हमारा।।


प्रिय पौत्र पांजल को
जन्म दिन पर
दादा जी का शुभाशीर्वाद!

26 फ़रवरी, 2011

"भैंस हमारी सीधी-सादी" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

सीधी-सादी, भोली-भाली।
लगती सुन्दर हमको काली।।

भैंस हमारी बहुत निराली।
खाकर करती रोज जुगाली।।

इसका बच्चा बहुत सलोना।
प्यारा सा है एक खिलौना।।

बाबा जी इसको टहलाते।
गर्मी में इसको नहलाते।।

गोबर रोज उठाती अम्मा।
सानी इसे खिलाती अम्मा।

गोबर की हम खाद बनाते।
खेतों में सोना उपजाते।।

भूसा-खल और चोकर खाती।
सुबह-शाम आवाज लगाती।।

कहती दूध निकालो आकर।
धन्य हुए हम इसको पाकर।।

25 फ़रवरी, 2011

"मेरा खरगोश" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

रूई जैसा कोमल-कोमल,
लगता कितना प्यारा है।
बड़े-बड़े कानों वाला,
सुन्दर खरगोश हमारा है।।

बहुत प्यार से मैं इसको,
गोदी में बैठाता हूँ।
बागीचे की हरी घास,
मैं इसको रोज खिलाता हूँ।।

मस्ती में भरकर यह
लम्बी-लम्बी दौड़ लगाता है।
उछल-कूद करता-करता,
जब थोड़ा सा थक जाता है।।

तब यह उपवन की झाड़ी में,
छिप कर कुछ सुस्ताता है।
ताज़ादम हो करके ही,
मेरे आँगन में आता है।।

नित्य-नियम से सुबह-सवेरे,
यह घूमने जाता है।
जल्दी उठने की यह प्राणी,
सीख हमें दे जाता है।।

24 फ़रवरी, 2011

"बालकविता-हाथी" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")


सूंड उठाकर नदी किनारे
पानी पीता हाथी।
सजी हुई है इसके ऊपर
सुन्दर-सुन्दर काठी।।

इस काठी पर बैठाकर
यह वन की सैर कराता।
बच्चों और बड़ों को
जंगल दिखलाने ले जाता।।

भारी तन का, कोमल मन का,
समझदार साथी है।
सर्कस में करतब दिखलाता
 प्यारा लगता हाथी है।।

20 फ़रवरी, 2011

"क्या मैना होती है ऐसी?" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

मैं तुमको गुरगल कहता हूँ,
लेकिन तुम हो मैना जैसी।
तुम गाती हो कर्कश सुर में,
क्या मैना होती है ऐसी??

सुन्दर तन पाया है तुमने,
लेकिन बहुत घमण्डी हो।
नहीं जानती प्रीत-रीत को,
तुम चिड़िया उदण्डी हो।।

जल्दी-जल्दी कदम बढ़ाकर,
तुम आगे को बढ़ती हो।
अपनी सखी-सहेली से तुम,
सौतन जैसी लड़ती हो।।

भोली-भाली चिड़ियों को तुम,
लड़कर मार भगाती हो।
प्यारे-प्यारे कबूतरों को भी,
तुम बहुत सताती हो।।

मीठी बोली से ही तो,
मन का उपवन खिलता है।
अच्छे-अच्छे कामों से ही,
जग में यश मिलता है।।

बैर-भाव को तजकर ही तो,
अच्छे तुम कहलाओगे।
मधुर वचन बोलोगे तो,
सबके प्यारे बन जाओगे।।

15 फ़रवरी, 2011

"काँव-काँवकर, चिल्लाया है कौआ" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

काले रंग का चतुर-चपल,
पंछी है सबसे न्यारा।
डाली पर बैठा कौओं का, 
जोड़ा कितना प्यारा।

नजर घुमाकर देख रहे ये,
कहाँ मिलेगा खाना।
जिसको खाकर कर्कश स्वर में,
छेड़ें राग पुराना।।

काँव-काँव का इनका गाना,
सबको नहीं सुहाता।
लेकिन बच्चों को कौओं का,
सुर है बहुत लुभाता।।

कोयलिया की कुहू-कुहू,
बच्चों को रास न आती।
कागा की प्यारी सी बोली, 
इनका मन बहलाती।।

देख इसे आँगन में,
शिशु ने बोला औआ-औआ।
खुश होकर के काँव-काँवकर,
चिल्लाया है कौआ।।

10 फ़रवरी, 2011

"जीने का ये मर्म बताते" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

चंचल-चंचल, मन के सच्चे।
सबको अच्छे लगते बच्चे।।

कितने प्यारे रंग रंगीले।
उपवन के हैं सुमन सजीले।।
भोलेपन से भरमाते हैं।
ये खुलकर हँसते-गाते हैं।।

भेद-भाव को नहीं मानते।
बैर-भाव को नहीं ठानते।।

काँटों को भी मीत बनाते।
नहीं मैल मन में हैं लाते।।

जीने का ये मर्म बताते।
प्रेम-प्रीत का कर्म सिखाते।।

01 फ़रवरी, 2011

"तीन रंग का झण्डा प्यारा" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

तीन रंग का झण्डा न्यारा।
हमको है प्राणों से प्यारा।।

त्याग और बलिदानों का वर।
रंग केसरिया सबसे ऊपर।।

इसके बाद श्वेत रंग आता।
हमें शान्ति का ढंग सुहाता।।

सबसे नीचे रंग हरा है।
हरी-भरी यह वसुन्धरा है।।

बीचों-बीच चक्र है सुन्दर।
हों विकास भारत के अन्दर।।
चित्रांकन
प्रांजल
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