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‘‘हमारा सूरज’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘‘मयंक’’)

>> 04 April, 2010


पूरब से जो उगता है और पश्चिम में छिप जाता है।
यह प्रकाश का पुंज हमारा सूरज कहलाता है।।


रुकता नही कभी भी चलता रहता सदा नियम से,
दुनिया को नियमित होने का पाठ पढ़ा जाता है।
यह प्रकाश का पुंज हमारा सूरज कहलाता है।।

नही किसी से भेद-भाव और वैर कभी रखता है,
सदा हितैषी रहने की शिक्षा हमको दे जाता है।
यह प्रकाश का पुंज हमारा सूरज कहलाता है।।

सूर्य उदय होने पर जीवों में जीवन आता है,
भानु रात और दिन का हमको भेद बताता है।
यह प्रकाश का पुंज हमारा सूरज कहलाता है।।

दूर क्षितिज में रहकर तुम सबको जीवन देते हो,
भुवन-भास्कर तुमको सब जग शीश नवाता है।
यह प्रकाश का पुंज हमारा सूरज कहलाता है।।

7 comments:

वन्दना अवस्थी दुबे 4 अप्रैल 2010 7:20 अपराह्न  

बहुत सुन्दर, सहज कविता, हमेशा की तरह.

मनोज कुमार 4 अप्रैल 2010 8:23 अपराह्न  

बेहतरीन। लाजवाब।

Shekhar kumawat 4 अप्रैल 2010 9:35 अपराह्न  

aap hamare sahitya jagat ke suraj he jo ham sab par andhkari agayanta par satya ka prakash dal rahe he

aap ko badhai

bahut achi kavita he ye


बेहतरीन।

Babli 4 अप्रैल 2010 9:58 अपराह्न  

मनमोहक और ख़ूबसूरत ! बहुत ही सुन्दरता से आपने प्रस्तुत किया है!

Suman 4 अप्रैल 2010 10:29 अपराह्न  

nice

वन्दना 5 अप्रैल 2010 11:59 पूर्वाह्न  

sundar , sargarbhit , sahaj aur ek behtreen kavita.

Prem Farrukhabadi 6 अप्रैल 2010 9:28 अपराह्न  
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