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“महाकुम्भ-मेला” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

>> 25 April, 2010


महाकुम्भ-स्नान
हरिद्वार, उज्जैन, प्रयाग।
नासिक के जागे हैं भाग।।

बहुत बड़ा यहाँ लगता मेला।
लोगों का आता है रेला।।
सुर-सरिता के पावन तट पर।
सभी लगाते डुबकी जी भर।।

बारह वर्ष बाद जो आता।
महाकुम्भ है वो कहलाता।। 

भक्त बहुत इसमें जाते हैं।
साधू-सन्यासी आते हैं।।
   जन-मन को हर्षाने वाला।
श्रद्धा का यह पर्व निराला।।
(चित्र गूगल सर्च से साभार) 

8 comments:

वन्दना 25 अप्रैल 2010 4:39 अपराह्न  

gazab ki prastuti.........mahakumbh ke ghar baithe hi darshan kara diye.

नीरज जाट जी 25 अप्रैल 2010 4:45 अपराह्न  

कुम्भ खत्म
कविता शुरू

Babli 25 अप्रैल 2010 6:38 अपराह्न  

वाह बहुत सुन्दर चित्रों के साथ आपने बखूबी प्रस्तुत किया है! महाकुम्भ का दर्शन करवाने के लिए धन्यवाद!

रावेंद्रकुमार रवि 25 अप्रैल 2010 8:30 अपराह्न  

बिल्कुल नए विषय को चुनकर
रची गई जानकारी देती हुई बालकविता!

sangeeta swarup 26 अप्रैल 2010 9:01 अपराह्न  

चित्रों के साथ और कविता में बहते हुए महाकुम्भ का आनंद हमें भी मिला...आभार

Prem Farrukhabadi 27 अप्रैल 2010 9:31 अपराह्न  

Bhai ghar baithe maza aa gaya. Dil se Badhai!!

गत्यात्मक ज्योतिष 2 मई 2010 12:21 पूर्वाह्न  

बढिया रचना !!

रावेंद्रकुमार रवि 2 मई 2010 5:24 पूर्वाह्न  

उपयोगी होने के कारण
चर्चा मंच पर

मेरा मन मुस्काया!

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