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11 अप्रैल, 2010

“पेंसिल” (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

रंग-बिरंगी पेंसिलें तो,
हमको खूब लुभाती हैं।
ये ही हमसे ए.बी.सी.डी.,
क.ख.ग. लिखवाती हैं।।


रेखा-चित्र बनाना,
इनके बिना असम्भव होता है।
कला बनाना भी तो,
केवल इनसे सम्भव होता है।।


गल्ती हो जाये तो,
लेकर रबड़ तुरन्त मिटा डालो।
गुणा-भाग करना चाहो तो,
बस्ते में से इसे निकालो।।


छोटी हो या बड़ी क्लास,
ये काम सभी में आती है।
इसे छीलते रहो कटर से,
यह चलती ही जाती है।।


तख्ती,कलम,स्लेट का,
तो इसने कर दिया सफाया है।
बदल गया है समय पुराना,
नया जमाना आया है।।

(चित्र गूगल सर्च से साभार)

7 टिप्‍पणियां:

  1. वाह...पेंसिल के सारे गुण बता दिए इस बालकविता ने....बहुत अच्छी कविता

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  2. वाह बहुत ही सुन्दर बाल कविता।

    जवाब देंहटाएं
  3. पेंसिल की उपयोगिता का बखान करती
    एक उपयोगी बाल-कविता!

    जवाब देंहटाएं
  4. पेंसिल की उपयोगिता का बखान करती
    एक उपयोगी बाल-कविता!

    जवाब देंहटाएं
  5. चर्चा मंच पर
    महक उठा मन
    शीर्षक के अंतर्गत
    इस पोस्ट की चर्चा की गई है!

    --
    संपादक : सरस पायस

    जवाब देंहटाएं

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