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‘‘मोबाइल फोन’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

>> 23 February, 2010

mobile
पापा ने दिलवाया मुझको,
सेल-फोन इक प्यारा सा।
मन-भावन रंगों वाला,
यह एक खिलौना न्यारा सा।।


रोज सुबह को मुझे जगाता,
मोबाइल कहलाता है।
दूर-दूर तक बात कराता,
सही समय बतलाता है।।


नम्बर डायल करो किसी का,
पता-ठिकाना बतलाओ।
मुट्ठी में इसको पकड़ो और,
संग कहीं भी ले जाओ।।


इससे नेट चलाओ चाहे,
बात करो दुनिया भर में।
यह सबके मन को भाता है,
लोकलुभावन घर-घर में।।


बटन दबाते ही मोबाइल,
काम टार्च का देता है।
पलक झपकते ही यह सारा,
अंधियारा हर लेता है।।


सेल-फोन इस युग का,
इक छोटा सा है कम्प्यूटर।
गुणा-भाग करने वाला,
बन जाता कैल-कुलेटर।।

6 comments:

sangeeta swarup 23 फरवरी 2010 9:53 पूर्वाह्न  

आज कल तकनीकि का ज़माना है....मोबाइल के बारे में सारी जानकारी देती अच्छी रचना....सुन्दर बालगीत

महफूज़ अली 23 फरवरी 2010 9:58 पूर्वाह्न  

बहुत सुंदर कविता....

वन्दना 23 फरवरी 2010 3:45 अपराह्न  

bahut sundar baal geet.

RaniVishal 23 फरवरी 2010 8:40 अपराह्न  

सुंदर कविता....आभार!!

वन्दना 18 जून 2011 12:20 अपराह्न  

आपकी पुरानी नयी यादें यहाँ भी हैं .......ज़रा गौर फरमाइए
http://nayi-purani-halchal.blogspot.com/

वन्दना 18 जून 2011 12:29 अपराह्न  

आपकी पुरानी नयी यादें यहाँ भी हैं .......कल ज़रा गौर फरमाइए
http://nayi-purani-halchal.blogspot.com/

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