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18 फ़रवरी, 2010

“संगीता स्वरूप का बालगीत” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

“चूहे की होली” 


 चूहा  खेल रहा था होली।
रंगो की लेकर रंगोली।।

भर पिचकारी उसने मारी।
बिल्ली  मौसी भीगी सारी।।

अब बिल्ली को गुस्सा आया।
उसने चूहे को धमकाया।।

चूहा थर-थर काँप रहा था। 
डरकर माफ़ी  मांग रहा था।।

हंस कर तब बिल्ली ये बोली।
होली है भई , है भई  होली।।

चूहा  ये सुनकर मुस्काया। 
उसने लाल गुलाल  उड़ाया।।

दोनों ने त्यौहार मनाया।
होली का हुडदंग  मचाया।।

sangitaswaroop
(संगीता स्वरूप)