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11 जून, 2010

"चन्दा-मामा" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

!! चन्दा-मामा !!
नभ में कैसा दमक रहा है। 
चन्दा मामा चमक रहा है।।

कभी बड़ा मोटा हो जाता। 
और कभी छोटा हो जाता।।


करवा-चौथ पर्व जब आता। 
चन्दा का महत्व बढ़ जाता।। 

मम्मीजी छत पर जाकर के। 
इसको तकती हैं जी-भर के।। 

यह सुहाग का शुभ दाता है। 
इसीलिए पूजा जाता है।।

जब भी बादल छा जाता है। 
तब "मयंक" शरमा जाता है।।

लुका-छिपी का खेल दिखाता। 
छिपता कभी प्रकट हो जाता।।


 धवल चाँदनी लेकर आता। 
आँखों को शीतल कर जाता।। 

सारे जग से न्यारा मामा। 
सब बच्चों का प्यारा मामा।।


(सभी चित्र गूगल सर्च से साभार)

08 जून, 2010

“मधुमक्खी है नाम तुम्हारा!” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

मधुमक्खी
honey-bee
मधुमक्खी है नाम तुम्हारा।   
शहद बनाती कितना सारा।। 


इसको छत्ते में रखती हो।  
लेकिन कभी नही चखती हो।। IMG_1108 
कंजूसी इतनी करती हो।  
रोज तिजोरी को भरती हो।। 


दान-पुण्य का काम नही है।  
दया-धर्म का नाम नही है।। 


इक दिन डाका पड़ जायेगा।  
शहद-मोम सब उड़ जायेगा।। 


मिट जायेगा यह घर-बार।  
लुट जायेगा यह संसार।। 


जो मिल-बाँट हमेशा खाता।  
कभी नही वो है पछताता।।

06 जून, 2010

"कल मुझको तुम भूल न जाना!" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

आमों के बागों में जाकर,
आम टोकरी भरकर लाया!
घर के लोगों ने जी भरकर,
चूस-चूस कर इनको खाया!!
प्राची बिटिया और प्रांजल,
बड़े चाव से इनको खाते!
मीठे-मीठे और रसीले,
आम बहुत इनको हैं भाते!!
राज-दुलारो, नन्हे-मुन्नों,
कल मुझको तुम भूल न जाना!
जब मैं बूढ़ा हो जाऊँगा,
इसी तरह तुम मुझे खिलाना!!


01 जून, 2010

“शायद वर्षा जल्दी आये” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

टर्र-टर्र मेंढक टर्राए!
शायद वर्षा जल्दी आये!

बाजारों में आम आ गये,
अमलतास पर फूल छा गये,
लेकिन बारिस नजर न आये!

टर्र-टर्र मेंढक टर्राए!
शायद वर्षा जल्दी आये!

सूख गये सब ताल-तलैय्या, 
छोटू कहाँ चलाए नैय्या!
सबको गर्मी बहुत सताए!

टर्र-टर्र मेंढक टर्राए!
शायद वर्षा जल्दी आये!

29 मई, 2010

“सूरज-चन्दा:श्रीमती संगीता स्वरूप”

"सूरज चाचा-चन्दा मामा"


सूरज चाचा , सूरज चाचा
जैसे  ही  तुम  आते  हो
नयी  सुबह की  नयी किरण को
अपने  संग  में लाते हो  |

फूलों से उपवन  भर जाता
भौंरे  गुनगुन  गाते हैं
चिड़ियों  का कलरव सुनते ही
झट बच्चे  उठ जाते  हैं  |

चाचा जब  तुम आते हो
मामा  तब घर को जाते हैं
तुम तो काम बहुत देते  हो

मामा  हमें सुलाते हैं  |

26 मई, 2010

“आम रसीले मन को भाये” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

सरदी भागी, गरमी आई!
पेड़ों पर हरियाली छाई!! 
वासन्ती मौसम गदराया!
वृक्ष आम का है बौराया!!
0 बागों में कोयलिया बोली!
कानों में मिश्री सी घोली!!
सूरज पर चढ़ गई जवानी!
अच्छा लगता शीतल पानी!!
IMG_1205लू के गरम थपेड़े खाकर!
आम झूलते हैं पेड़ों पर!!
Playing in the Rainमानसून की बदली छाई!
छम-छम जल की बूँदें आई!!
आम रसीले मन को भाये!
हमने बड़े मजे से खाये!!

20 मई, 2010

“तितली रानी” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

"नन्हे सुमन का 50वाँ पुष्प"


तितली रानी, तितली रानी!
तुमने क्या है मन में ठानी!!


उड़कर दूर देश से आई!
लगता है लग गई थकाई!!


सुस्ताने को हाथ मिला है!
मुझे तुम्हारा साथ मिला है!!
IMG_1197तुम रंगों का भरा समन्दर!
पंख तुम्हारे लगते सुन्दर!!


चलो तुम्हें मैं ले जाता हूँ!
थोड़ा पानी पिलवाता हूँ!!


ताजादम जब हो जाओगी!
पंख हिलाती उड़ जाओगी!!

16 मई, 2010

“खरबूजे का मौसम आया” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

पिकनिक करने का मन आया!
मोटर में सबको बैठाया!!
family_car_250पहुँच गये जब नदी किनारे!
खरबूजे के खेत निहारे!!
_44621951_07melon_afp ककड़ी, खीरा और तरबूजे!
कच्चे-पक्के थे खरबूजे!!
prachi&pranjalप्राची, किट्टू और प्रांजल!
करते थे जंगल में मंगल!!

लो मैं पेटी में भर लाया!
खरबूजों का मौसम आया!! 
rcmelonदेख पेड़ की शीतल छाया!
हमने आसन वहाँ बिछाया!!
picknicजम करके खरबूजे खाये!
शाम हुई घर वापिस आये!!

13 मई, 2010

“लीची के गुच्छे मन भाए!” (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

हरी, लाल और पीली-पीली!
बिकती लीची बहुत रसीली!!

IMG_1175
गुच्छा प्राची के मन भाया!
उसने उसको झट कब्जाया!!

IMG_1178 लीची को पकड़ा, दिखलाया!
भइया को उसने ललचाया!!

IMG_1179प्रांजल के भी मन में आया!
सोचा इसको जाए खाया!!

IMG_1180गरमी का मौसम आया है!
लीची के गुच्छे लाया है!!

IMG_1177दोनों ने गुच्छे लहराए!
लीची के गुच्छे मन भाए!!

09 मई, 2010

‘‘बगुला भगत’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


बगुला भगत बना है कैसा?
लगता एक तपस्वी जैसा।।


अपनी धुन में अड़ा हुआ है।
एक टाँग पर खड़ा हुआ है।।


धवल दूध सा उजला तन है।
जिसमें बसता काला मन है।।


मीनों के कुल का घाती है।
नेता जी का यह नाती है।।


बैठा यह तालाब किनारे।
छिपी मछलियाँ डर के मारे।।


पंख कभी यह नोच रहा है।
आँख मूँद कर सोच रहा है।।


मछली अगर नजर आ जाये।
मार झपट्टा यह खा जाये।।


इसे देख धोखा मत खाना।
यह ढोंगी है जाना-माना।।

(चित्र गूगल सर्च से साभार)

06 मई, 2010

‘‘उल्लू’’ (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


उल्लू का रंग-रूप निराला।
लगता कितना भोला-भाला।।

अन्धकार इसके मन भाता।
सूरज इसको नही सुहाता।।

यह लक्ष्मी जी का वाहक है।
धन-दौलत का संग्राहक है।।

इसकी पूजा जो है करता।
ये उसकी मति को है हरता।।

धन का रोग लगा देता यह।
सुख की नींद भगा देता यह।।

सबको इसके बोल अखरते।
बड़े-बड़े इससे हैं डरते।।

विद्या का वैरी कहलाता।
ये बुद्धू का है जामाता।।

पढ़-लिख कर ज्ञानी बन जाना।
कभी न उल्लू तुम कहलाना।।

(चित्र गूगल सर्च से साभार)

04 मई, 2010

"सुमन हमें सिखलाते हैं" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री मयंक)

“शिक्षाप्रद बाल-कविता”


काँटों में पलना जिनकी,
किस्मत का लेखा है।
फिर भी उनको खिलते,
मुस्काते हमने देखा है।।

कड़ी घूप हो सरदी या,

बारिस से मौसम गीला हो।
पर गुलाब हँसता ही रहता,
चाहे काला, पीला हो।।

ये उपवन में हँसकर,
भँवरों के मन को बहलाते हैं।
दुख में कभी न विचलित होना,
सुमन हमें सिखलाते हैं।।

(चित्र गूगल सर्च से साभार)

28 अप्रैल, 2010

‘‘कूलर’’ (डा. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

ठण्डी-ठण्डी हवा खिलाये।
इसी लिए कूलर कहलाये।।

जब जाड़ा कम हो जाता है।
होली का मौसम आता है।।

फिर चलतीं हैं गर्म हवाएँ।
यही हवाएँ लू कहलायें।।

तब यह बक्सा बड़े काम का।
सुख देता है परम धाम का।।

कूलर गर्मी हर लेता है।
कमरा ठण्डा कर देता है।।

चाहे घर हो या हो दफ्तर।
सजा हुआ है यह खिड़की पर।।

इसकी महिमा अपरम्पार।
यह ठण्डक का है भण्डार।।

जब आता है मास नवम्बर।
बन्द सभी हो जाते कूलर।।

(चित्र गूगल सर्च से साभार)

25 अप्रैल, 2010

“महाकुम्भ-मेला” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)


महाकुम्भ-स्नान
हरिद्वार, उज्जैन, प्रयाग।
नासिक के जागे हैं भाग।।

बहुत बड़ा यहाँ लगता मेला।
लोगों का आता है रेला।।
सुर-सरिता के पावन तट पर।
सभी लगाते डुबकी जी भर।।

बारह वर्ष बाद जो आता।
महाकुम्भ है वो कहलाता।। 

भक्त बहुत इसमें जाते हैं।
साधू-सन्यासी आते हैं।।
   जन-मन को हर्षाने वाला।
श्रद्धा का यह पर्व निराला।।
(चित्र गूगल सर्च से साभार) 

21 अप्रैल, 2010

“बाल कविता:समीर लाल (उड़नतश्तरी)”

“गर्मी की छुट्टी”
-समीर लाल ’समीर’
गर्मी की छुट्टी

कर ली हमने खूब पढ़ाई
पढ़कर के आँखें खुजलाई
लिखी परीक्षा मेहनत कर के
तब गर्मी की छुट्टी आई.



अब होगा बस खेल तमाशा
सुबह शाम को धूम धमाका
सब बच्चे घर में खेलेंगे
धूप भला हम क्यूँ झेलेंगे..

पापा संग जा कुल्फी खाई
जब गर्मी की छुट्टी आई.



दिन भर खूब कहानी पढ़ते
आपस में हम नहीं झगड़ते
कार्टून टी.वी. पर आया
बच्चों ने मन को बहलाया..

मौसी हमसे मिलने आई
जब गर्मी की छुट्टी आई.



दीदी से कम्प्यूटर सीखा
हमें लगा वो स्वप्न सरीखा
पलक झपकते सब बतलाता
दुनिया भर की सैर कराता..

समय उड़ा बन हवा हवाई
जब गर्मी की छुट्टी आई.



-समीर लाल ’समीर’

16 अप्रैल, 2010

“लैपटॉप” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

“लैपटॉप”

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इस बस्ते में क्या है भइया,
हमें खोल कर दिखलाओ!
कहाँ चले तुम इसको लेकर,
कुछ हमको भी बतलाओ!! 

इसमें प्यारा लैपटॉप है,
छोटा सा है कम्प्यूटर!
नये जमाने का इसको ही,
हम तो कहते हैं ट्यूटर!!
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जो कुछ डेस्कटॉप में होता,
वही सभी कुछ है इसमें!
चाहे कहीं इसे ले जाओ,
यही खूबियाँ हैं इसमें!!

अगर घूमने जाओ पार्क में,
संग इसे भी ले जाओ!
रेल और बस में जाओ तो,
इससे इण्टरनेट चलाओ!!

गाना सुनने का यदि मन हो,
मनचाहा तुम गीत सुनो!
देशी और विदेशी चाहे,
कैसा भी संगीत सुनो!!

इसमें छोटा माउस-पैड है,
सुन्दर सा की-बोर्ड बना है!
यह खिलौना बहुत सलोना,
मुझको इससे प्यार घना है!!

14 अप्रैल, 2010

“नानी जी का घर” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)


मई महीना आता है और,
जब गर्मी बढ़ जाती है।
नानी जी के घर की मुझको,
बेहद याद सताती है।।


तब मैं मम्मी से कहती हूँ,
नानी के घर जाना है।
नानी के प्यारे हाथों से,
आइसक्रीम भी  खाना है।।


कथा-कहानी मम्मी तुम तो,
मुझको नही सुनाती हो।
नानी जैसे मीठे स्वर में,
गीत कभी नही गाती हो।।


मेरी नानी मेरे संग में,
दिन भर खेल खेलतीं है।
मेरी नादानी-शैतानी,
हँस-हँस रोज झेलतीं हैं।।


मास-दिवस गिनती हैं नानी,
आस लगाये रहती हैं।
प्राची-बिटिया को ले आओ,
वो नाना से कहती हैं।।

11 अप्रैल, 2010

“पेंसिल” (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

रंग-बिरंगी पेंसिलें तो,
हमको खूब लुभाती हैं।
ये ही हमसे ए.बी.सी.डी.,
क.ख.ग. लिखवाती हैं।।


रेखा-चित्र बनाना,
इनके बिना असम्भव होता है।
कला बनाना भी तो,
केवल इनसे सम्भव होता है।।


गल्ती हो जाये तो,
लेकर रबड़ तुरन्त मिटा डालो।
गुणा-भाग करना चाहो तो,
बस्ते में से इसे निकालो।।


छोटी हो या बड़ी क्लास,
ये काम सभी में आती है।
इसे छीलते रहो कटर से,
यह चलती ही जाती है।।


तख्ती,कलम,स्लेट का,
तो इसने कर दिया सफाया है।
बदल गया है समय पुराना,
नया जमाना आया है।।

(चित्र गूगल सर्च से साभार)

06 अप्रैल, 2010

“बिन वेतन का चौकीदार” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”

“आज मैं अपने कुत्ते “टॉम” को

कंघी कर रहा था तो

सरस पायस के सम्पादक

श्री रावेंद्रकुमार रवि ने

इसके ये प्यारे-प्यारे चित्र

मेरे कैमरे में कैद कर ही दिये!”

और बन गयी
यह प्यारी सी बाल-कविता!
टॉम हमारा कितना अच्छा!
लगता है यह सीधा सच्चा!!
IMG_1115
ठण्डे जल से रोज नहाता!
फिर मुझसे कंघी करवाता!! 
IMG_1118 बड़े-बड़े हैं इसके बाल!
एक आँख है इसकी लाल!!
IMG_1116घर भर को है इससे प्यार!
प्राची करती इसे दुलार!!
बिन वेतन का चौकीदार!
सच्चा है यह पहरेदार!!

04 अप्रैल, 2010

‘‘हमारा सूरज’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘‘मयंक’’)


पूरब से जो उगता है और पश्चिम में छिप जाता है।
यह प्रकाश का पुंज हमारा सूरज कहलाता है।।


रुकता नही कभी भी चलता रहता सदा नियम से,
दुनिया को नियमित होने का पाठ पढ़ा जाता है।
यह प्रकाश का पुंज हमारा सूरज कहलाता है।।

नही किसी से भेद-भाव और वैर कभी रखता है,
सदा हितैषी रहने की शिक्षा हमको दे जाता है।
यह प्रकाश का पुंज हमारा सूरज कहलाता है।।

सूर्य उदय होने पर जीवों में जीवन आता है,
भानु रात और दिन का हमको भेद बताता है।
यह प्रकाश का पुंज हमारा सूरज कहलाता है।।

दूर क्षितिज में रहकर तुम सबको जीवन देते हो,
भुवन-भास्कर तुमको सब जग शीश नवाता है।
यह प्रकाश का पुंज हमारा सूरज कहलाता है।।

02 अप्रैल, 2010

“पढ़ना-लिखना मजबूरी है!” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)


मुश्किल हैं विज्ञान, गणित,
हिन्दी ने बहुत सताया है।
अंग्रेजी की देख जटिलता,
मेरा मन घबराया है।।  


भूगोल और इतिहास मुझे,
बिल्कुल भी नही सुहाते हैं।
श्लोकों के कठिन अर्थ,
मुझको करने नही आते हैं।। 


देखी नही किताब उठाकर,
खेल-कूद में समय गँवाया,
अब सिर पर आ गई परीक्षा,
माथा मेरा चकराया।। 


बिना पढ़े ही मुझको,
सारे प्रश्नपत्र हल करने हैं।
किस्से और कहानी से ही,
कागज-कॉपी भरने हैं।।


नाहक अपना समय गँवाया,
मैं यह खूब मानता हूँ।
स्वाद शून्य का चखना होगा,
मैं यह खूब जानता हूँ।।


तन्दरुस्ती के लिए खेलना,
सबको बहुत जरूरी है।
किन्तु परीक्षा की खातिर,
पढ़ना-लिखना मजबूरी है।।