“मदारी का खेल : रानीविशाल” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)
>> 03 March, 2010
"एक खेल मदारी का" डम-डम, डम-डम डमरू बाजा। उछला-कूदा, छुटकू राजा।। खाना खाकर ताजा-ताजा। ठुमक-ठुमककर छुटकू नाचा।। वानर-राजा खेल दिखाते। बच्चे तालीखूब बजाते।। छुटकी को कर रहा इशारा। लगता सबको कितना प्यारा।। अब छुटकी भी उठकर आई। खेल-खेल में धूम मचाई।। सबको जमकर खूब हँसाया। हाथ जोड़कर शीश नवाया।। कितनी मेहनत दोनों करते। पेट मदारी का ये भरते।। |






8 comments:
बहुत ही प्यारी कविता लगी ।
nice
बहुत अच्छा । बहुत सुंदर प्रयास है। जारी रखिये ।
आपका लेख अच्छा लगा।
हिंदी को आप जैसे ब्लागरों की ही जरूरत है ।
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bahut hi sundar kavita......badhayi.
बहुत सुन्दर बाल रचना
बहुत सुन्दर...ऐसा लगा की सामने ही मदारी खेल दिखा रहा है.....बधाई
Aap sab ko bahut bahut dhanywaad aur sabse jyada aabhar adarniya Shashtriji ka jinhone rachana ke swarup ko apane shabd shilp se bahut khubsurat banaya hai...aapko phir se dhanyawaad!
bahut mithi, mast kavita
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