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‘‘गुब्बारे’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

>> 15 March, 2010




बच्चों को लगते जो प्यारे।

वो कहलाते हैं गुब्बारे।।




गलियों, बाजारों, ठेलों में।
गुब्बारे बिकते मेलों में।।

काले, लाल, बैंगनी, पीले।

कुछ हैं हरे, बसन्ती, नीले।।



पापा थैली भर कर लाते।

जन्म-दिवस पर इन्हें सजाते।।



गलियों, बाजारों, ठेलों में।

गुब्बारे बिकते मेलों में।।



फूँक मार कर इन्हें फुलाओ।

हाथों में ले इन्हें झुलाओ।।

सजे हुए हैं कुछ दुकान में।

कुछ उड़ते हैं आसमान में।।



मोहक छवि लगती है प्यारी।

गुब्बारों की महिमा न्यारी।।

(चित्र गूगल सर्च से साभार)

5 comments:

वन्दना 15 मार्च 2010 12:07 अपराह्न  

bahut hi sundar chitra lagaye hain aur utni hi pyari kavita hai.........badhayi.

Udan Tashtari 15 मार्च 2010 5:47 अपराह्न  

बढ़िया बाल गीत!!

M VERMA 15 मार्च 2010 7:27 अपराह्न  

क्या कहने शास्त्री जी
निश्चय ही बच्चा बन जाते होंगे इतनी सुन्दर रचना करते समय

रावेंद्रकुमार रवि 15 मार्च 2010 7:43 अपराह्न  

सचमुच गुब्बारे बच्चों के प्रिय खिलौने हैं!
आपने बिल्कुल सही कहा है -
"गुब्बारों की महिमा न्यारी!"

sangeeta swarup 16 मार्च 2010 12:25 अपराह्न  

बहुत सुन्दर प्यारे प्यारे गुबारों की तरह ही प्यारी रचना...

"चुराइए मत! अनुमति लेकर छापिए!!

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