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15 जून, 2010

“भक्तों जोड़ो इनसे नाता” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

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सुन्दर-सुन्दर और सजीले!

आकर्षक और रंग-रंगीले!!

शिवशंकर और साँईबाबा!
यहाँ विराजे काशी-काबा!!

कृष्ण-कन्हैया अलबेला है!
कोई गुरू कोई चेला है!!

जग-जननी माँ पार्वती हैं!
धवल वस्त्र में सरस्वती हैं!!

आदि-देव की छटा निराली!
इनकी सूँड बहुत मतवाली!!

जो जी चाहे वो ले जाओ!
सिंहासन पर इन्हें बिठाओ!!

मन में हों यदि नेक भावना!
पूरी होंगी सभी कामना!!

बेच रहा मैं भगवानों को!
खोज रहा हूँ श्रीमानों को!!

ये सब मेरे भाग्य-विधाता!
भक्तों जोड़ो इनसे नाता!!

9 टिप्‍पणियां:

  1. सरल, सहज रूप में यथार्थ को अभिव्यक्त करती सशक्त व सार्थक रचना।

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  2. sahi kaha kuch becharon ko petki khatir bhagwaan bhi bechne padte hain...

    जवाब देंहटाएं
  3. बेच रहा मैं भगवानों को!
    खोज रहा हूँ श्रीमानों को!!
    क्या कहें ………सब कुछ सम्भव है…………सुन्दर रचना।

    जवाब देंहटाएं
  4. नमस्ते,

    आपका बलोग पढकर अच्चा लगा । आपके चिट्ठों को इंडलि में शामिल करने से अन्य कयी चिट्ठाकारों के सम्पर्क में आने की सम्भावना ज़्यादा हैं । एक बार इंडलि देखने से आपको भी यकीन हो जायेगा ।

    जवाब देंहटाएं
  5. सुन्दर और सटीक रचना...

    बेच रहा मैं भगवानों को!
    खोज रहा हूँ श्रीमानों को!!

    कोई भगवान भी नहीं खरीदता ...

    जवाब देंहटाएं
  6. मनभावन होने के कारण
    "सरस पायस" पर हुई "सरस चर्चा" में
    इन्हें देख मन गाने लगता!
    शीर्षक के अंतर्गत
    इस पोस्ट की चर्चा की गई है!

    जवाब देंहटाएं

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