यह है अपना चिंकू प्यारा। पूरे घर का राजदुलारा।। मन का अच्छा तन का काला। घर भर का सच्चा रखवाला।। हरदम रहता है चौकन्ना। बड़े प्यार से खाता गन्ना।। खुश हो करके नित्य नहाता। अंडा-मांस नहीं ये खाता।। लगता है भोला-भण्डारी। पर दुश्मन चोरों का भारी।। कभी न करता लापरवाही। बिन वेतन का सजग सिपाही।। |
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29 मार्च, 2022
बालकविता "बिन वेतन का सजग सिपाही" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
27 अक्टूबर, 2018
बालकविता "सब बच्चों का प्यारा मामा" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
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सारे जग से न्यारा मामा।
सब बच्चों का प्यारा मामा।।
नभ में कैसा दमक रहा है।
चन्दा कितना चमक रहा है।।
कभी बड़ा छोटा हो जाता।
और कभी मोटा हो जाता।।
करवाचौथ पर्व जब आता।
चन्दा का महत्व बढ़ जाता।।
महिलायें छत पर जा करके।
आसमान तकतीं जी भरके।।
यह सुहाग का शुभ दाता है।
इसीलिए पूजा जाता है।।
जब नभ में बादल छा जाता।
तब ‘मयंक’ का पता न पाता।।
लुका-छिपी का खेल दिखाता।
छिपता कभी प्रकट हो जाता।।
धवल चाँदनी लेकर आता।
आँखों को शीतल कर जाता।।
यह नभ से अमृत टपकाता।
सबको इसका ‘रूप’ सुहाता।।
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21 फ़रवरी, 2017
बालकविता "खेतों में शहतूत उगाओ"

कितना सुन्दर और सजीला।
खट्टा-मीठा और रसीला।।
हरे-सफेद, बैंगनी-काले।
छोटे-लम्बे और निराले।।
हैं शहतूत बहुत गुण वाले।।
पारा जब दिन का बढ़ जाता।
तब शहतूत बहुत मन भाता।
इसका वृक्ष बहुत उपयोगी।
ठण्डी छाया बहुत निरोगी।।
टहनी-डण्ठल सब हैं बढ़िया।
इनसे बनती हैं टोकरियाँ।।
इनसे बनती हैं टोकरियाँ।।
रेशम के
कीड़ों का पालन।
निर्धन को देता है यह धन।।
निर्धन को देता है यह धन।।
आँगन-बगिया में उपजाओ।
खेतों में शहतूत उगाओ।।
खेतों में शहतूत उगाओ।।
20 फ़रवरी, 2017
बालकविता "बच्चों का संसार निराला" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
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बच्चों का संसार निराला।।
बचपन सबसे होता अच्छा।
बच्चों का मन होता सच्चा।
पल में रूठें, पल में मानें।
बैर-भाव को ये क्या जानें।।
प्यारे-प्यारे सहज-सलोने।
बच्चे तो हैं स्वयं खिलौने।।
बच्चों से होती है माता।
ममता से है माँ का नाता।।
बच्चों से है दुनियादारी।
बच्चों की महिमा है न्यारी।।
कोई बचपन को लौटा दो।
फिर से बालक मुझे बना दो।।
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15 फ़रवरी, 2017
बालकविता "तीखी-मिर्च कभी मत खाओ" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)
तीखी-तीखी और चर्परी।
हरी मिर्च थाली में पसरी।।
तोते इसे प्यार से खाते।
मिर्च देखकर खुश हो जाते।।
सब्ज़ी का यह स्वाद बढ़ाती।
किन्तु पेट में जलन मचाती।।
जो ज्यादा मिर्ची खाते हैं।
सुबह-सुबह वो पछताते हैं।।
दूध-दही बल देने वाले।
रोग लगाते, मिर्च-मसाले।।
शाक-दाल को घर में लाना।
थोड़ी मिर्ची डाल पकाना।।
तीखी-मिर्च कभी मत खाओ।
सदा सुखी जीवन अपनाओ।।
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13 फ़रवरी, 2017
बालकविता "सबके प्यारे बन जाओगे" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

मैं तुमको गुरगल कहता हूँ,
लेकिन तुम हो मैना जैसी।
तुम गाती हो कर्कश सुर में,
क्या मैना होती है ऐसी??
सुन्दर तन पाया है तुमने,
लेकिन बहुत घमण्डी हो।
नहीं जानती प्रीत-रीत को,
तुम चिड़िया उदण्डी हो।।
जल्दी-जल्दी कदम बढ़ाकर,
तुम आगे को बढ़ती हो।
अपनी सखी-सहेली से तुम,
सौतन जैसी लड़ती हो।।
लड़कर मार भगाती हो।
प्यारे-प्यारे कबूतरों को भी,
तुम बहुत सताती हो।।
मीठी बोली से ही तो,
मन का उपवन खिलता है।
अच्छे-अच्छे कामों से ही,
जग में यश मिलता है।।
बैर-भाव को तजकर ही तो,
अच्छे तुम कहलाओगे।
मधुर वचन बोलोगे तो,
सबके प्यारे बन जाओगे।।
10 फ़रवरी, 2017
बालकविता "क.ख.ग.घ. सिखलाऊँगी" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)
चित्रांकन - कु. प्राची
मम्मी देखो मेरी डॉल।
खेल रही है यह तो बॉल।।
पढ़ना-लिखना इसे न आता।
खेल-खेलना बहुत सुहाता।।
कॉपी-पुस्तक इसे दिलाना।
विद्यालय में नाम लिखाना।।
मैं गुड़िया को रोज सवेरे।
लाड़ लड़ाऊँगी बहुतेरे।।
विद्यालय में ले जाऊँगी।
क.ख.ग.घ. सिखलाऊँगी।।
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06 फ़रवरी, 2017
बालकविता "काँव-काँव कर चिल्लाया है कौआ" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)
काले रंग का चतुर-चपल,
पंछी है सबसे न्यारा।
डाली पर बैठा कौओं का,
जोड़ा कितना प्यारा।
नजर घुमाकर देख रहे ये,
कहाँ मिलेगा खाना।
जिसको खाकर कर्कश स्वर में,
छेड़ें राग पुराना।।
काँव-काँव का इनका गाना,
सबको नहीं सुहाता।
लेकिन बच्चों को कौओं का,
सुर है बहुत लुभाता।।
कोयलिया की कुहू-कुहू,
बच्चों को रास न आती।
कागा की प्यारी सी बोली,
इनका मन बहलाती।।
देख इसे आँगन में,
शिशु ने बोला औआ-औआ।
खुश होकर के काँव-काँव कर,
चिल्लाया है कौआ।।
31 जनवरी, 2017
बालकविता "लगता एक तपस्वी जैसा" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)
![]() बगुला भगत बना है कैसा? लगता एक तपस्वी जैसा।। अपनी धुन में अड़ा हुआ है। एक टाँग पर खड़ा हुआ है।। धवल दूध सा उजला तन है। जिसमें बसता काला मन है।। मीनों के कुल का घाती है। नेता जी का यह नाती है।। बैठा यह तालाब किनारे। छिपी मछलियाँ डर के मारे।। पंखों को यह नोच रहा है। आँख मूँद कर सोच रहा है।। मछली अगर नजर आ जाये। मार झपट्टा यह खा जाये।। इसे देख धोखा मत खाना। यह ढोंगी है जाना-माना।। |
24 जनवरी, 2017
बालकविता "क.ख.ग. लिखवाती हैं" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)
रंग-बिरंगी पेंसिलें तो, हमको खूब लुभाती हैं। ये ही हमसे ए.बी.सी.डी., क.ख.ग. लिखवाती हैं।। रेखा-चित्र बनाना, इनके बिना असम्भव होता है। कला बनाना भी तो, केवल इनसे सम्भव होता है।। गल्ती हो जाये तो, लेकर रबड़ तुरन्त मिटा डालो। गुणा-भाग करना चाहो तो, बस्ते में से इसे निकालो।। छोटी हो या बड़ी क्लास, ये काम सभी में आती है। इसे छीलते रहो कटर से, यह चलती ही जाती है।। तख्ती,कलम,स्लेट का, तो इसने कर दिया सफाया है। बदल गया है समय पुराना, नया जमाना आया है।। |
22 जनवरी, 2017
बालकविता "नानी के घर जाना है" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)
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मई महीना आता है और, जब गर्मी बढ़ जाती है। नानी जी के घर की मुझको, बेहद याद सताती है।। तब मैं मम्मी से कहती हूँ, नानी के घर जाना है। नानी के प्यारे हाथों से, आइसक्रीम भी खाना है।। कथा-कहानी मम्मी तुम तो, मुझको नही सुनाती हो। नानी जैसे मीठे स्वर में, गीत कभी नही गाती हो।। मेरी नानी मेरे संग में, दिन भर खेल खेलतीं है। मेरी नादानी-शैतानी, हँस-हँस रोज झेलतीं हैं।। मास-दिवस गिनती हैं नानी, आस लगाये रहती हैं। प्राची-बिटिया को ले आओ, वो नाना से कहती हैं।। |
20 जनवरी, 2017
बालकविता "विद्यालय लगता है प्यारा" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)
18 जनवरी, 2017
बालकविता "नौकर है यह बिना दाम का" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)
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बिल्ली का दुश्मन है भारी।।
बन्दर अगर इसे दिख जाता।
भौंक-भौंक कर उसे भगाता।।
उछल-उछल कर दौड़ लगाता।
बॉल पकड़ कर जल्दी लाता।।
यह सीधा-सच्चा लगता है।
बच्चों को अच्छा लगता है।।
धवल दूध सा तन है सारा।
इसका नाम फिरंगी प्यारा।।
आँखें इसकी चमकीली हैं।
भूरी सी हैं और नीली हैं।।
जग जाता है यह आहट से।
साथ-साथ चल पड़ता झट से।।
प्यारा सा पिल्ला ले आना।
सुवह शाम इसको टहलाना।।
वफादार है बड़े काम का।
नौकर है यह बिना दाम का।।
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17 जनवरी, 2017
बालकविता "अपना ऊँचा नाम करूँ" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
13 जनवरी, 2017
बालकविता "गुब्बारों की महिमा न्यारी" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
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बच्चों को लगते जो प्यारे।
वो कहलाते हैं गुब्बारे।। गलियों, बाजारों, ठेलों में।
गुब्बारे बिकते मेलों में।।
काले, लाल, बैंगनी, पीले।
कुछ हैं हरे, बसन्ती, नीले।।
पापा थैली भर कर लाते।
जन्म-दिवस पर इन्हें सजाते।।
गलियों, बाजारों, ठेलों में।
गुब्बारे बिकते मेलों में।।
फूँक मार कर इन्हें फुलाओ।
हाथों में ले इन्हें झुलाओ।।
सजे हुए हैं कुछ दुकान में।
कुछ उड़ते हैं आसमान में।।
मोहक छवि लगती है प्यारी।
गुब्बारों की महिमा न्यारी।।
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