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14 अक्तूबर, 2011

"मकड़ी-मकड़े" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

मित्रों! आज प्रांजल-प्राची ने माँग रखी कि
बाबा जी मकड़ी पर लिखिए न!
उन्हीं की माँगपर प्रस्तुत है यह बालकविता!

कीट-पतंगे, मच्छर-मक्खी,
कच्चे जालों में जकड़े।
उनको ही तो कहती दुनिया,
आठ टाँग के मकड़ी-मकड़े।।

जाल बुना करते ये हरदम
झाड़ी और दीवारों पर।
और दौड़ते रहते हैं ये,
इन महीन से तारों पर।।

कभी यह ऊपर को चढ़ते,
कभी फिसल नीचे आ जाते।
किन्तु निरन्तर कोशिश करते,
श्रम से कभी नहीं घबड़ाते।।

अपने पथ को निर्मित करते,
देखो इन यजमानों को।
करते रहते हैं ये प्रेरित,
जग में सब इन्सानों को।

एक बार हो गये विफल तो,
अगली बार सफल होंगे।
यदि होंगे मजबूत इरादे,
कभी नहीं असफल होंगे।।

15 टिप्‍पणियां:

  1. वाह बहुत ही सुंदर संदेश मयी बाल कविता ....

    जवाब देंहटाएं
  2. करते रहते हैं ये प्रेरित,
    जग में सब इन्सानों को।

    बहुत बढ़िया |
    बधाई ||
    http://dineshkidillagi.blogspot.com/

    जवाब देंहटाएं
  3. बहुत सुन्दर संदेशमयी बाल कविता।

    जवाब देंहटाएं
  4. वाह बहुत ही सुंदर बाल कविता| धन्यवाद|

    जवाब देंहटाएं
  5. वाह! वाह!
    एक मकड़ी ने काटा तो एक बच्चा, स्पाइडर मैन बन गया था। मैने भी बहुत कहा कि ऐ मकड़ी! मुझे भी स्पाइडर मैन बना दो न...! मगर किसी ने नहीं बनाया।

    जवाब देंहटाएं
  6. वाह बहुत ही सुंदर संदेश मयी बाल कविता ....

    Bloggers Meet Weekly 14 ke liye yahi chuni gayi hai .

    जवाब देंहटाएं
  7. आदरणीय शास्त्री जी अभिवादन ..सुन्दर रचना ..हम काफी दिन इन रचनाओं से दूर रहे अब मै बच्चा भी लुत्फ़ .....
    भ्रमर ५
    बाल झरोखा सत्यम की दुनिया

    एक बार हो गये विफल तो,
    अगली बार सफल होंगे।
    यदि होंगे मजबूत इरादे,
    कभी नहीं असफल होंगे।।

    जवाब देंहटाएं

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