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11 अगस्त, 2013

"मेरा बस्ता कितना भारी" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मेरी बालकृति "नन्हें सुमन" से
एक बालकविता
"मेरा बस्ता कितना भारी"

मेरा बस्ता कितना भारी।
बोझ उठाना है लाचारी।।

मेरा तो नन्हा सा मन है।
छोटी बुद्धि दुर्बल तन है।।

पढ़नी पड़ती सारी पुस्तक।
थक जाता है मेरा मस्तक।।

रोज-रोज विद्यालय जाना।
बड़ा कठिन है भार उठाना।।

कम्प्यूटर का युग अब आया।
इसमें सारा ज्ञान समाया।।

मोटी पोथी सभी हटा दो।
बस्ते का अब भार घटा दो।।

एक पुस्तिका पेन चाहिए।
हमको मन में चैन चाहिए।।
कम्प्यूटर जी पाठ पढ़ायें।
हम बच्चों का ज्ञान बढ़ाये।

इतने से चल जाये काम।
छोटा बस्ता हो आराम।।

07 अगस्त, 2013

"चिड़िया रानी" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक.)

मेरी बालकृति "नन्हें सुमन" से
एक बालकविता
"चिड़िया रानी"
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चिड़िया रानी फुदक-फुदक कर,
मीठा राग सुनाती हो।
आनन-फानन में उड़ करके,
आसमान तक जाती हो।।

मेरे अगर पंख होते तो,
मैं भी नभ तक हो आता।
पेड़ो के ऊपर जा करके,
ताजे-मीठे फल खाता।।

जब मन करता मैं उड़ कर के,
नानी जी के घर जाता।
आसमान में कलाबाजियाँ कर के,
सबको दिखलाता।।

सूरज उगने से पहले तुम,
नित्य-प्रति उठ जाती हो।
चीं-चीं, चूँ-चूँ वाले स्वर से ,
मुझको रोज जगाती हो।।

तुम मुझको सन्देशा देती,
रोज सवेरे उठा करो।
अपनी पुस्तक को ले करके,
पढ़ने में नित जुटा करो।।

चिड़िया रानी बड़ी सयानी,
कितनी मेहनत करती हो।
एक-एक दाना बीन-बीन कर,
पेट हमेशा भरती हो।।

अपने कामों से मेहनत का,
पथ हमको दिखलाती हो।।
जीवन श्रम के लिए बना है,
सीख यही सिखलाती हो।

03 अगस्त, 2013

"लिखना-पढ़ना सिखला दो" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक.)

मेरी बालकृति "नन्हें सुमन" से
एक बालकविता
"लिखना-पढ़ना सिखला दो"
भैया! मुझको भी,
लिखना-पढ़ना, सिखला दो।
क.ख.ग.घ, ए.बी.सी.डी,
गिनती भी बतला दो।।

पढ़ लिख कर मैं,
मम्मी-पापा जैसे काम करूँगी।
दुनिया भर में,
बापू जैसा अपना नाम करूँगी।।

रोज-सवेरे, साथ-तुम्हारे,
मैं भी उठा करूँगी।
पुस्तक लेकर पढ़ने में,
मैं संग में जुटा करूँगी।।

बस्ता लेकर विद्यालय में,
मुझको भी जाना है।
इण्टरवल में टिफन खोल कर,
खाना भी खाना है।।

छुट्टी में गुड़िया को,
ए.बी.सी.डी, सिखलाऊँगी।
उसके लिए पेंसिल और,
इक कापी भी लाऊँगी।।

30 जुलाई, 2013

"तितली रानी" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक.)

मेरी बालकृति "नन्हें सुमन" से
एक बालकविता
"तितली रानी"
मन को बहुत लुभाने वाली,
तितली रानी कितनी सुन्दर।
भरा हुआ इसके पंखों में,
रंगों का है एक समन्दर।।

उपवन में मंडराती रहती,
फूलों का रस पी जाती है।
अपना मोहक रूप दिखाने,
यह मेरे घर भी आती है।।

भोली-भाली और सलोनी,
यह जब लगती है सुस्ताने।
इसे देख कर एक छिपकली,
आ जाती है इसको खाने।।

आहट पाते ही यह उड़ कर,
बैठ गयी चौखट के ऊपर।
मेरा मन भी ललचाया है,
मैं भी देखूँ इसको छूकर।।

इसके रंग-बिरंगे कपड़े,
होली की हैं याद दिलाते।
सजी धजी दुल्हन को पाकर,
बच्चे फूले नही समाते।। 

25 जुलाई, 2013

"भगवान एक है" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

मेरी बालकृति "नन्हें सुमन" से
एक बालकविता
"भगवान एक है"
मन्दिर, मस्जिद और गुरूद्वारे।
भक्तों को लगते हैं प्यारे।।
 
हिन्दू मन्दिर में हैं जाते।
देवताओं को शीश नवाते।।

ईसाई गिरजाघर जाते।
दीन-दलित को गले लगाते।।
 
अल्लाह का फरमान जहाँ है।
मुस्लिम का कुर-आन वहाँ है।।
जहाँ इमाम नमाज पढ़ाता।
मस्जिद उसे पुकारा जाता।।

सिक्खों को प्यारे गुरूद्वारे,
मत्था वहाँ टिकाते सारे।।
राहें सबकी अलग-अलग हैं।
पर सबके अरमान नेक है।
 
नाम अलग हैं, पन्थ भिन्न हैं।
पर जग में भगवान एक है।।

21 जुलाई, 2013

"नन्हें सुमन की पहली रचना" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मेरी बालकृति "नन्हें सुमन"
की पहली रचना
वन्दना के रूप में
 
तान वीणा की सुनाओ कर रहे हम कामना।
माँ करो स्वीकार सुमनों की प्रबल आराधना।।

अब ध्ररा पर ज्ञान की गंगा बहाओ,
तम मिटाकर सत्य के पथ को दिखाओ,
लक्ष्य में बाधक बना अज्ञान का जंगल घना।
माँ करो स्वीकार सुमनों की प्रबल आराधना।।

बेसुरे से राग में, अनुराग भर दो,
फँस गये हैं हम भँवर में, पार कर दो,
शारदे माँ कुमति हरकर सबको मेधावी बना।
माँ करो स्वीकार सुमनों की प्रबल आराधना।।

वन्दना है आपसे, रसना में रस की धार दो,
हम निपट अज्ञानियों को मातु निज आधार दो,
माँ हमें वरदान दो, होवें सफल सब साधना।
माँ करो स्वीकार सुमनों की प्रबल आराधना।।

17 जुलाई, 2013

"‘नन्हे सुमन’ में प्रकाशित रचनाओं का शुभारम्भ" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

मित्रों....!

   आज से नन्हे सुमन में प्रकाशित रचनाओं का शुभारम्भ इस पुस्तक की भूमिका से कर रहा हूँ।


      विगतवर्ष बाल कविताओं की मेरी प्रथम बालकृति 'नन्हे सुमन' के नाम से प्रकाशित हुई थी। उन दिनों हिन्दी ब्लॉगिंग के पुरोधा आदरणीय समीर लाल 'समीर' भारत आये हुए थे। दूरभाष पर बातें हुईं और उन्होंने इस पुस्तक की भूमिका लिखने की सहर्ष स्वीकृति मुझे प्रदान कर दी। मैंने मेल से उन्हें 'नन्हे सुमन' की पाण्डुलिपि भेज दी और उन्होंने एक सप्ताह के भीतर इसकी भूमिका लिखकर मुझे मेल कर दी। मैं उनके प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करते हुए इस भूमिका को आपके साथ साझा कर रहा हूँ!
भूमिका
एक अद्भुत संसार - 'नन्हें सुमन'
            आज की इस भागती दौड़ती दुनिया में जब हर व्यक्ति अपने आप में मशगूल है। वह स्पर्धा के इस दौर में मात्र वही करना चाहता है जो उसे मुख्य धारा में आगे ले जाये, ऐसे वक्त में दुनिया भर के बच्चों के लिए मुख्य धारा से इतर कुछ स्रजन करना श्री रुपचन्द्र शास्त्री मयंक जैसे सहृदय कवियों को एक अलग पहचान देता है।

            ‘मयंक जी ने बच्चों के लिए रचित बाल रचनाओं के माध्यम से न सिर्फ उनके ज्ञानवर्धन एवं मनोरंजन का बीड़ा उठाया है बल्कि उन्हें एक बेहतर एवं सफल जीवन के रहस्य और संदेश देकर एक जागरूक नागरिक बनाने का भी बखूबी प्रयास किया है।
            पुस्तक नन्हें सुमन अपने शीर्षक में ही सब कुछ कह जाती है कि यह नन्हें-मुन्नों के लिए रचित काव्य है। परन्तु जब इसकी रचनायें पढ़ी तो मैंने स्वयं भी उनका भरपूर आनन्द उठाया। बच्चों के लिए लिखी कविता के माध्यम से उन्होंने बड़ों को भी सीख दी है!
डस्टर बहुत कष्ट देता है’’ कविता का यह अंश बच्चों की कोमल पीड़ा को स्पष्ट परिलक्षित करता है-

‘‘कोई तो उनसे यह पूछे,
क्या डस्टर का काम यही है?
कोमल हाथों पर चटकाना,
क्या इसका अपमान नही है?’’

       ‘नन्हें सुमन में छपी हर रचना अपने आप में सम्पूर्ण है और उनसे गुजरना एक सुखद अनुभव है। उनमें एक जागरूकता है, ज्ञान है, संदेश है और साथ ही साथ एक अनुभवी कवि की सकारात्मक सोच है.
    आराध्य माँ वीणापाणि की आराधना करते हुए कवि लिखता है-

‘‘तार वीणा के सुनाओ कर रहे हम कामना।
माँ करो स्वीकार नन्हे सुमन की आराधना।।
इस ध्ररा पर ज्ञान की गंगा बहाओ,
तम मिटाकर सत्य के पथ को दिखाओ,
लक्ष्य में बाधक बना अज्ञान का जंगल घना।
माँ करो स्वीकार नन्हे सुमन की आराधना।।’’

            मेरे दृष्टिकोण से तो यह एक संपूर्ण पुस्तक है जो बाल साहित्य के क्षेत्र में एक नया प्रतिमान स्थापित करेगी। मुझे लगता है कि इसे न सिर्फ बच्चों को बल्कि बड़ों को भी पढ़ना चाहिये।
            मेरा दावा है कि आप एक अद्भुत संसार सिमटा पायेंगे नन्हें सुमन में, बच्चों के लिए और उनके पालकों के लिए भी!
            कवि ‘‘मयंक’’ को इस श्रेष्ठ कार्य के लिए मेरा साधुवाद, नमन एवं शुभकामनाएँ!

-समीर लाल समीर
http://udantashtari.blogspot.com/
36, Greenhalf Drive
Ajax, ON
Canada

06 मार्च, 2013

" प्राञ्जल की 14वीं वर्षगाँठ" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

कल मेरे पौत्र प्राञ्जल की 
14वीं वर्षगाँठ थी!

इस अवसर पर प्रिय प्राञ्जल को
दिल की गहराइयों से 
शुभकामनाएँ और आशीर्वाद!
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रचा-बसा था उस समय, होली का त्यौहार।
पौत्ररत्न के रूप में, मिला हमें उपहार।।
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जन्मदिवस पर आपको, देते हम आशीष।
पढ़-लिखकर बन जाइए, जल्दी से वागीश।।
रोज सुबह सन्देश आपका, जब हमको मिल जाता है।
मन-उपवन का हर कोनातब खिलकर मुस्काता है।।

जीवन कैसे जियेंयही सच्चे साथी सिखलाते हैं।
मर्म कर्म का हमेंहमारे शुभचिन्तक बतलाते हैं।
साथी पथ पर बढ़ने की जब सच्ची राह दिखाता है।
मन-उपवन का हर कोनातब खिलकर मुस्काता है।।

दूर देश से आयी तितलीसोई कली जनाने को,
उठो सवेरा हुआ-समेटो उगते हुए खज़ाने को,
कलिकाओं को सुमन बनाने कोभँवरा मंडराता है।
मन-उपवन का हर कोनातब खिलकर मुस्काता है।।

बाँटो प्यार सभी कोये जीवन तो बहुत जरा सा है,
अमृत पाने कीसबके मन में होती अभिलाषा है,
लेकिन जिसने पिया गरलवो महादेव कहलाता है।
मन-उपवन का हर कोनातब खिलकर मुस्काता है।।

जब हम आते हैं   दुनिया मेंसभी बधायी देते हैं,
अनजानी सी मूरत मेंहम बचपन को पा लेते हैं,
खुशियों का परिवेशजगत में सबको बहुत सुहाता है।
मन-उपवन का हर कोनातब खिलकर मुस्काता है।।