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14 अप्रैल, 2010

“नानी जी का घर” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)


मई महीना आता है और,
जब गर्मी बढ़ जाती है।
नानी जी के घर की मुझको,
बेहद याद सताती है।।


तब मैं मम्मी से कहती हूँ,
नानी के घर जाना है।
नानी के प्यारे हाथों से,
आइसक्रीम भी  खाना है।।


कथा-कहानी मम्मी तुम तो,
मुझको नही सुनाती हो।
नानी जैसे मीठे स्वर में,
गीत कभी नही गाती हो।।


मेरी नानी मेरे संग में,
दिन भर खेल खेलतीं है।
मेरी नादानी-शैतानी,
हँस-हँस रोज झेलतीं हैं।।


मास-दिवस गिनती हैं नानी,
आस लगाये रहती हैं।
प्राची-बिटिया को ले आओ,
वो नाना से कहती हैं।।

12 टिप्‍पणियां:

  1. अब तो नाना के घर जाने की तैयारी होगी. मई महीना जो आने वाला है

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  2. bahut pyaari kavita hai , idhar ham bhi apne laadale kee naanee ke ghar matlab apne mammee paapaa ke paas jaane ki taiyaari kar rahe hai , mai maheenaa jo aa rahaa hai...:)

    जवाब देंहटाएं

  3. नानी के प्यारे हाथों से,
    आइसक्रीम भी खाना है।।


    कथा-कहानी मम्मी तुम तो,
    मुझको नही सुनाती हो।
    नानी जैसे मीठे स्वर में
    bachchon ka masoom bachpan hai aapki muththi me

    जवाब देंहटाएं
  4. बच्चों के मन के भाव कितनी खूबसूरती से कह देते हैं आप....बहुत प्यारी रचना

    जवाब देंहटाएं
  5. तब मैं मम्मी से कहती हूँ,
    नानी के घर जाना है।
    नानी के प्यारे हाथों से,
    आइसक्रीम भी खाना है।।
    ...हम भी ऐसा ही कुछ सोच रहे हैं..

    ***************
    'पाखी की दुनिया' में इस बार "मम्मी-पापा की लाडली"

    जवाब देंहटाएं
  6. चर्चा मंच पर
    महक उठा मन
    शीर्षक के अंतर्गत
    इस पोस्ट की चर्चा की गई है!

    --
    संपादक : सरस पायस

    जवाब देंहटाएं
  7. नाना नानी के घर तो बहुत मजा आता है

    जवाब देंहटाएं

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