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28 अप्रैल, 2010

‘‘कूलर’’ (डा. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

ठण्डी-ठण्डी हवा खिलाये।
इसी लिए कूलर कहलाये।।

जब जाड़ा कम हो जाता है।
होली का मौसम आता है।।

फिर चलतीं हैं गर्म हवाएँ।
यही हवाएँ लू कहलायें।।

तब यह बक्सा बड़े काम का।
सुख देता है परम धाम का।।

कूलर गर्मी हर लेता है।
कमरा ठण्डा कर देता है।।

चाहे घर हो या हो दफ्तर।
सजा हुआ है यह खिड़की पर।।

इसकी महिमा अपरम्पार।
यह ठण्डक का है भण्डार।।

जब आता है मास नवम्बर।
बन्द सभी हो जाते कूलर।।

(चित्र गूगल सर्च से साभार)

13 टिप्‍पणियां:

  1. नन्हे सुमन पर सार्थक प्रस्तुति।

    जवाब देंहटाएं
  2. बहुत खूब ..सुन्दर प्रस्तुति...ठंडी हवा का झोंका सा देती रचना....बधाई

    जवाब देंहटाएं
  3. आपकी पकड इतनी मस्‍त है भाषा पर कि बडी ही सहजता से छोटी सी चीज को भी बडा और आकर्षक बना देते हैं।

    धन्‍यवाद

    जवाब देंहटाएं
  4. बहुत प्यारा गीत है..मजा आ गया पढ़कर.

    *******************************
    पाखी की दुनिया में इस बार चिड़िया-टापू की सैर !!

    जवाब देंहटाएं
  5. बढ़िया होने के कारण
    चर्चा मंच पर

    मेरा मन मुस्काया!

    शीर्षक के अंतर्गत
    इस पोस्ट की चर्चा की गई है!

    जवाब देंहटाएं
  6. अति सुन्दर पढ़ कर आनन्द आया।

    जवाब देंहटाएं
  7. अति सुन्दर, पढ़ कर आनन्द आया।

    जवाब देंहटाएं

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