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12 जुलाई, 2011

"प्लम" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

गया आम का मौसम,
प्लम बाजारों में अब छाया।
इनको देख-देख कर देखो,
सबका मन ललचाया।।
 
लाल-लाल हैं जितने पोलम,
वो हैं खट्टे-मीठे,
लेकिन जो महरून रंग के,
वो लगते हैं मीठे,
पर्वत से शृंगार उतर कर,
मैदानों में आया।
 
अल्मौड़ा, चौखुटिया,
नैनीताल और चम्पावत,
प्लम के पेड़ों के बागीचे,
फैले हैं बहुतायत,
हरे-भरे इन वृक्षों ने है,
मन को बहुत लुभाया।
 
मार शीत की झेल-झेल,
शीतल फल हुए रसीले,
बारिश का पानी पीकर,
हो जाते नीले-पीले,
बच्चों और बड़ों ने इनको
बहुत चाव से खाया।

9 टिप्‍पणियां:

  1. बेहतरीन पंक्तियाँ और सुंदर तसवीरें. मज़ा आ गया आज

    जवाब देंहटाएं
  2. बेहतरीन पंक्तियाँ और सुंदर तसवीरें

    जवाब देंहटाएं
  3. अरे वाह प्लम ...मुझे भी बहुत अच्छा लगता है.... आपकी कविता भी प्यारी है...

    जवाब देंहटाएं
  4. सुंदर प्रस्तुति,बहुत सुंदर चित्र....

    जवाब देंहटाएं
  5. इन्हें प्लम कहते हैं या पुलम? मैंने तो पुलम सुना है।
    और शायद लोकाट भी तो यही होता है।

    जवाब देंहटाएं

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