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01 अप्रैल, 2020

बालगीत "पूरी दुनिया में कोरोना" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


रोग अगर दिखलाई दे तो,
कभी न करना जादू-टोना।
अपने पैर पसार चुका है,
पूरी दुनिया में कोरोना।।

बाहर नहीं निकलना घर से,
घर में पूरा समय बिताओ।
हर घंटे हाथों को धोओ,
साफ-सफाई को अपनाओ।
अपनी पुस्तक को दोहराओ,
यह अनमोल समय मत खोना।
अपने पैर पसार चुका है,
पूरी दुनिया में कोरोना।।

शीतल पेय कभी मत पीना,
आइसक्रीम अभी मत खाना।
ताजा-ताजा भोजन खाओ,
नियम सुरक्षा के अपनाना।
दिनचर्या को करो नियम से,
जल्दी उठना, जल्दी सोना।
अपने पैर पसार चुका है,
पूरी दुनिया में कोरोना।।

अच्छी सीख बड़ों की मानो,
बे-मतलब की जिद मत करना।
सच्ची बातों को कहने में,
कभी किसी से तुम मत डरना।
सुमनों से मित्रता निभाना,
मन के मनके सदा पिरोना।
अपने पैर पसार चुका है,
पूरी दुनिया में कोरोना।।

08 मार्च, 2017

बालगीत "होली का मौसम अब आया" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

रंग-गुलाल साथ में लाया।
होली का मौसम अब आया।
पिचकारी फिर से आई हैं,
बच्चों के मन को भाई हैं,
तन-मन में आनन्द समाया।
होली का मौसम अब आया।।
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गुझिया थाली में पसरी हैं,
पकवानों की महक भरी हैं, 
मठरी ने मन को ललचाया।
होली का मौसम अब आया।।
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बरफी की है शान निराली,
भरी हुई है पूरी थाली,
अम्मा जी ने इसे बनाया।
होली का मौसम अब आया।।
मम्मी बोली पहले खाओ,
उसके बाद खेलने जाओ,
सूरज ने मुखड़ा चमकाया।
होली का मौसम अब आया।

27 जनवरी, 2017

बालगीत "प्रकाश का पुंज हमारा सूरज" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


पूरब से जो उगता है और पश्चिम में छिप जाता है।
यह प्रकाश का पुंज हमारा सूरज कहलाता है।। 
रुकता नही कभी भी चलता रहता सदा नियम से, 
दुनिया को नियमित होने का पाठ पढ़ा जाता है। 
यह प्रकाश का पुंज हमारा सूरज कहलाता है।। 
नही किसी से भेद-भाव ये बैर कभी रखता है, 
सदा हितैषी रहने की शिक्षा हमको दे जाता है। 
यह प्रकाश का पुंज हमारा सूरज कहलाता है।। 
सूर्य उदय होने पर जीवों में जीवन आता है,
सबके लिए समानरूप से सुख की बारिश बरसाता है,
यह प्रकाश का पुंज हमारा सूरज कहलाता है।। 
दूर क्षितिज में रहकर तुम सबको जीवन देते हो, 
भुवन-भास्कर तुमको सब जग शीश नवाता है। 
यह प्रकाश का पुंज हमारा सूरज कहलाता है।।

21 जनवरी, 2017

बालगीत "मेरी प्यारी मुनिया" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

 
इतनी जल्दी क्या है बिटिया, 
सिर पर पल्लू लाने की।
अभी उम्र है गुड्डे-गुड़ियों के संग,
समय बिताने की।।


मम्मी-पापा तुम्हें देख कर,
मन ही मन हर्षाते हैं।
जब वो नन्ही सी बेटी की,
छवि आखों में पाते है।।

जब आयेगा समय सुहाना, 
देंगे हम उपहार तुम्हें।
तन मन धन से सब सौगातें, 
देंगे बारम्बार तुम्हें।।

दादी-बाबा की प्यारी, 
तुम सबकी राजदुलारी हो।
घर आंगन की बगिया की, 
तुम मनमोहक फुलवारी हो।।

सबकी आँखों में बसती हो, 
इस घर की तुम दुनिया हो।
प्राची तुम हो बड़ी सलोनी, 
मेरी प्यारी मुनिया हो।।

10 जून, 2014

"मेरा झूला" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मेरी बालकृति नन्हें सुमन से
 
एक बालकविता
"मेरा झूला"

मम्मी जी ने इसको डाला।
मेरा झूला बडा़ निराला।।

खुश हो जाती हूँ मैं कितनी,
जब झूला पा जाती हूँ।
होम-वर्क पूरा करते ही,
मैं इस पर आ जाती हूँ।
करता है मन को मतवाला।
मेरा झूला बडा़ निराला।।

मुझको हँसता देख,
सभी खुश हो जाते हैं।
बाबा-दादी, प्यारे-प्यारे,
नये खिलौने लाते हैं।
आओ झूलो, मुन्नी-माला।
मेरा झूला बडा़ निराला।।

28 मई, 2014

"इसे मदारी खूब नचाता" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मेरी बालकृति नन्हें सुमन से
एक बालगीत


बिना सहारे और सीढ़ी के,
झटपट पेड़ों पर चढ़ जाता।
गली मुहल्लों में लोगों को,
खों-खों करके बहुत डराता।

कोई इसको वानर कहता,
कोई हनूमान बतलाता।
मानव का पुरखा बन्दर है,
यह विज्ञान हमें सिखलाता।

लाठी और डुगडुगी लेकर,
इसे मदारी खूब नचाता।
यह करतब से हमें हँसाता,
माँग-माँग कर 
पैसा लाता।

जंगल के आजाद जीव को,
मानव देखो बहुत सताता।
देख दुर्दशा इन जीवों की,
तरस हमें इन पर है आता।।

18 फ़रवरी, 2014

"हमारा सूरज" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मेरी बालकृति नन्हें सुमन से
बालगीत
"हमारा सूरज"

पूरब से जो उगता है और पश्चिम में छिप जाता है। 
यह प्रकाश का पुंज हमारा सूरज कहलाता है।।

रुकता नही कभी भी चलता रहता सदा नियम से, 
दुनिया को नियमित होने का पाठ पढ़ा जाता है। 
यह प्रकाश का पुंज हमारा सूरज कहलाता है।।

नही किसी से भेद-भाव और वैर कभी रखता है, 
सदा हितैषी रहने की शिक्षा हमको दे जाता है।
यह प्रकाश का पुंज हमारा सूरज कहलाता है।। 

सूर्य उदय होने पर जीवों में जीवन आता है, 
भानु रात और दिन का हमको भेद बताता है। 
यह प्रकाश का पुंज हमारा सूरज कहलाता है।। 

दूर क्षितिज में रहकर तुम सबको जीवन देते हो, 
भुवन-भास्कर तुमको सब जग शीश नवाता है। 
यह प्रकाश का पुंज हमारा सूरज कहलाता है।।

21 जनवरी, 2014

"हमारी माता" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मेरी बालकृति नन्हें सुमन से
 
बालकविता
"हमारी माता"
माता के उपकार बहुत,
वो भाषा हमें बताती है!
उँगली पकड़ हमारी माता,
चलना हमें सिखाती है!!

दुनिया में अस्तित्व हमारा,
माँ के ही तो कारण है,
खुद गीले में सोकर,
वो सूखे में हमें सुलाती है!
उँगली पकड़ हमारी……..

देश-काल चाहे जो भी हो,
माँ ममता की मूरत है,
धोकर वो मल-मूत्र हमारा,
पावन हमें बनाती है!
उँगली पकड़ हमारी……..

पुत्र कुपुत्र भले हो जायें,
होती नही कुमाता माँ,
अपने हिस्से की रोटी,
बेटों को सदा खिलाती है!
उँगली पकड़ हमारी……..

नहीं उऋण हो सकता कोई,
अपनी जननी के ऋण से,
माँ का आदर करो सदा,
यह रचना यही सिखाती है!
उँगली पकड़ हमारी……

24 दिसंबर, 2013

"मेरा झूला बड़ा निराला" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मेरी बालकृति नन्हें सुमन से
 
एक बालकविता
"मेरा झूला बड़ा निराला"
मम्मी जी ने इसको डाला।
मेरा झूला बडा़ निराला।।

खुश हो जाती हूँ मैं कितनी,
जब झूला पा जाती हूँ।
होम-वर्क पूरा करते ही,
मैं इस पर आ जाती हूँ।
करता है मन को मतवाला।
मेरा झूला बडा़ निराला।।

मुझको हँसता देख,
सभी खुश हो जाते हैं।
बाबा-दादी, प्यारे-प्यारे,
नये खिलौने लाते हैं।
आओ झूलो, मुन्नी-माला।
मेरा झूला बडा़ निराला।।

28 नवंबर, 2013

"यह है मेरी काली कार" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मेरी बालकृति नन्हें सुमन से

एक बालकविता"यह है मेरी काली कार"

यह है मेरी काली कार।
करती हूँ मैं इसको प्यार।। 

जब यह फर्राटे भरती है, 
बिल्कुल शोर नही करती है, 
सिर्फ घूमते चक्के चार।  
करती हूँ मैं इसको प्यार।।

जब छुट्टी का दिन आता है, 
करना सफर हमें भाता है, 
हम इससे जाते हरद्वार। 
करती हूँ मैं इसको प्यार।।

गीत, गजल और भजन-कीर्तन, 
सुनो मजे से, जब भी हो मन, 
मंजिल यह कर देती पार। 
करती हूँ मैं इसको प्यार।।

24 नवंबर, 2013

"सीधा प्राणी गधा कहाता" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मेरी बालकृति नन्हें सुमन से

एक बालकविता
"सीधा प्राणी गधा कहाता"


कितना सारा भार उठाता।
लेकिन फिर भी गधा कहाता।। 
farmer-donkey-1रोज लाद कर अपने ऊपर, 
कपड़ों के गट्ठर ले जाता। 
वजन लादने वाले को भी, 
तरस नही इस पर है आता।। 
donkey -3जिनसे घर में चूल्हा जलता, 
उन लकड़ी-कण्डों को लाता। 
जिनसे पक्के भवन बने हैं, 
यह उन ईंटों को पहुँचाता।। 
donkey_11यह सीधा-सादा प्राणी है, 
घूटा और घास को खाता। 
जब ढेंचू-ढेंचू करता है, 
तब मालिक है मार लगाता।। 

सीधा प्राणी गधा कहाता,
सिर्फ काम से इसका नाता।
भूखा-प्यासा चलता जाता। 

फिर भी नही किसी को भाता।। 

07 नवंबर, 2013

"खों-खों करके बहुत डराता" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मेरी बालकृति नन्हें सुमन से
एक बाल कविता
"खों-खों करके बहुत डराता"

बिना सहारे और सीढ़ी के,
झटपट पेड़ों पर चढ़ जाता।
गली मुहल्लों और छतों पर,
खों-खों करके बहुत डराता।

कोई इसको वानर कहता,
कोई हनूमान बतलाता।
मानव का पुरखा बन्दर है,
यह विज्ञान हमें सिखलाता।

लाठी और डुगडुगी लेकर,
इसे मदारी खूब नचाता।
यह करतब से हमें हँसाता,
पैसा माँग-माँग कर लाता।

जंगल के आजाद जीव को,
मानव देखो बहुत सताता।
देख दुर्दशा इन जीवों की,
तरस हमें इन पर है आता।।

14 नवंबर, 2012

"चाचा नेहरू को नमन" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

बच्चों के प्यारे चाचा नेहरू को
शत्-शत् नमन!

जिस दिन लाल जवाहर ने था,
जन्म जगत में पाया।
उसका जन्मदिवस भारत में
बाल दिवस कहलाया।।

मोती लाल पिता बैरिस्टर,
माता थी स्वरूप रानी।
छोड़ सभी आराम-ऐश को,
राह चुनी थी बेगानी।।
त्याग वकालत को नेहरू ने,
गांधी का पथ अपनाया।
उसका जन्मदिवस भारत में
बाल दिवस कहलाया।।

आजादी पाने की खातिर,
वीरों ने बलिदान दिया।
अमर सपूतों ने पग-पग पर ,
अपमानों का पान किया।
दमन चक्र से जो गोरों के,
कभी नहीं घबराया।
उसका जन्मदिवस भारत में
बाल दिवस कहलाया।।

दागे नहीं तोप से गोले,
ना बरछी तलवार उठायी।
सत्य-अहिंसा के बल पर,
खोई आजादी पायी।
अनशन करकेअंग्रेजों से,
शासन वापिस पाया।
उसका जन्मदिवस भारत में
बाल दिवस कहलाया।।

बच्चों को जो सदा प्यार से,
हँसकर गले लगाता था।
इसीलिए तो लाल जवाहर,
चाचा जी कहलाता था
अपने जन्मदिवस को जिसने,
बालकदिवस बनाया।
उसका जन्मदिवस भारत में
बाल दिवस कहलाया।।

शासक था स्वदेश का पहला,
अपना प्यारा चाचा।
नवभारत के निर्माता का,
मन था सीधा-साचा।
उद्योगों का जिसने,
चौबिस घंटे चक्र चलाया।
उसका जन्मदिवस भारत में
बाल दिवस कहलाया।।