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15 जुलाई, 2011

"रेंग रही हैं बहुत गिजाई" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

छम-छम वर्षा आई।
रेंग रही हैं बहुत गिजाई।।
 पेड़ों की जड़ के ऊपर भी,
मिट्टी में कच्ची भूपर भी,
इनका झुण्ड पड़ा दिखलाई।
ईश्वर के कैसे कमाल हैं,
ये देखो ये लाल-लाल हैं,
सीधी-सरल बहुत हैं भाई।

कितनी सुन्दर, कितनी प्यारी,
धवल-धवल तन पर हैं धारी,
कितनी सुन्दर काया पाई।

6 टिप्‍पणियां:

  1. लागत बच्चा कौन सा, विषय कठिन बतलाव,
    शास्त्री जी के पास जा, ले ले तनिक सुझाव |

    ले ले तनिक सुझाव, गिजाई कान-खजूरा,
    आम चुकंदर प्यार, मिलेगा सब-कुछ पूरा |

    कर रविकर परनाम, कहत अब किस्मत जागत,
    गुरु -पूर्णिमा आज , आपके चरणन लागत ||

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  2. गिजाई देखने में बहुत घिनौनी लगती है, पर इतनी सुंदर कविता,
    वाह,
    विवेक जैन vivj2000.blogspot.com

    जवाब देंहटाएं
  3. गिजाईपर इतनी सुन्दर कविता ...बहुत सुन्दर...

    जवाब देंहटाएं
  4. parivartan hi zindagi hai...lekin parivartan ka ahsas nahi ho pata...aapi samay samay per post ki gayi kavitayein..aam ,mendhak ,gijai jaise bishayon ke taraf dhyan dilkar satat parivartit ho rahe mausam ke prati dhyan kheench le jaate hai...

    जवाब देंहटाएं
  5. Girjayee par bahut badiya prastuti..
    hamen to inhen dekhkar ajeeb si sihran hone lagti hai..
    Saadar

    जवाब देंहटाएं

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