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10 नवंबर, 2012

“खों-खों करके बहुत डराता” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


दीपावली की शुभकामनाओं के साथ
एक बाल कविता
बिना सहारे और सीढ़ी के,
झटपट पेड़ों पर चढ़ जाता।
बच्चों और बड़ों को भी ये,
खों-खों करके बहुत डराता।
 
कोई इसको वानर कहता,
कोई हनूमान बतलाता।
मानव का पुरखा बन्दर है,
यह विज्ञान हमें सिखलाता।
 
गली-मुहल्ले, नगर गाँव में,
इसे मदारी खूब नचाता।
बच्चों को ये खूब हँसाता,
पैसा माँग-माँग कर लाता।

 
कुनबे भर का पेट पालता,
लाठी से कितना घबराता।
तान डुगडुगी की सुन करके,
अपने करतब को दिखलाता।

9 टिप्‍पणियां:

  1. वाह शास्त्री जी बढिया रचना

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  2. बहुत बढ़िया शानदार बाल रचना बहुत बहुत बधाई

    जवाब देंहटाएं
  3. बढ़िया प्रस्तुति |
    बधाई स्वीकारें ||

    जवाब देंहटाएं
  4. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

    जवाब देंहटाएं
  5. दीपावली की शुभ कामनाओं के साथ-
    लिये 'प्रकाश हर्ष का सुन्दर' दीपावली के दीप जलें |
    मायूसी का न् हो 'अँधेरा' मन में 'जगमग'आस पले||

    जवाब देंहटाएं
  6. बहुत सुन्दर बाल कविता....

    जवाब देंहटाएं

  7. बाल मन को सहज रिझाती है यह रचना .

    जवाब देंहटाएं

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