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07 नवंबर, 2013
10 नवंबर, 2012
“खों-खों करके बहुत डराता” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)
![]() दीपावली की शुभकामनाओं के साथ एक बाल कविता बिना सहारे और सीढ़ी के,झटपट पेड़ों पर चढ़ जाता। बच्चों और बड़ों को भी ये, खों-खों करके बहुत डराता। कोई इसको वानर कहता, कोई हनूमान बतलाता। मानव का पुरखा बन्दर है, यह विज्ञान हमें सिखलाता। गली-मुहल्ले, नगर गाँव में, इसे मदारी खूब नचाता। बच्चों को ये खूब हँसाता, पैसा माँग-माँग कर लाता। कुनबे भर का पेट पालता, लाठी से कितना घबराता। तान डुगडुगी की सुन करके, अपने करतब को दिखलाता। |
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