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24 सितंबर, 2014

"नेशनल दुनिया में मेरी बालकविता-गुब्बारे" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

नई दिल्ली से प्रकाशित होने वाले 
दैनिक समाचार पत्र "नेशनल दुनिया"
में मेरी बाल कविता

"गुब्बारे"
बच्चों को लगते जो प्यारे।
वो कहलाते हैं गुब्बारे।।
 
गलियोंबाजारोंठेलों में।
गुब्बारे बिकते मेलों में।।
 
कालेलालबैंगनीपीले।
कुछ हैं हरेबसन्तीनीले।।
 
पापा थैली भर कर लाते।
जन्म-दिवस पर इन्हें सजाते।।
 
फूँक मार कर इन्हें फुलाओ।
हाथों में ले इन्हें झुलाओ।।
सजे हुए हैं कुछ दुकान में।
कुछ उड़ते हैं आसमान में।।
मोहक छवि लगती है प्यारी।
गुब्बारों की महिमा न्यारी।।

3 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर बाल रचना
    हार्दिक बधाई!

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  2. गुब्बारे पर आपकी कविता पढ़ी.कविता बहुत सुन्दर है.
    मेरी शुभकामनाएं.
    डॉ.राजकुमार शर्मा

    जवाब देंहटाएं

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