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18 जनवरी, 2017

बालकविता (बालवाणी में मेरी बालकविता 'उल्लू')

"उल्लू"
उल्लू का रंग-रूप निराला।
लगता कितना भोला-भाला।।

अन्धकार इसके मन भाता।
सूरज इसको नही सुहाता।।

यह लक्ष्मी जी का वाहक है।
धन-दौलत का संग्राहक है।।

इसकी पूजा जो है करता।
ये उसकी मति को है हरता।।

धन का रोग लगा देता यह।
सुख की नींद भगा देता यह।।

सबको इसके बोल अखरते।
बड़े-बड़े इससे हैं डरते।।

विद्या का वैरी कहलाता।
ये बुद्धू का है जामाता।।

पढ़-लिख कर ज्ञानी बन जाना।
कभी न उल्लू तुम कहलाना।।

24 सितंबर, 2014

"नेशनल दुनिया में मेरी बालकविता-गुब्बारे" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

नई दिल्ली से प्रकाशित होने वाले 
दैनिक समाचार पत्र "नेशनल दुनिया"
में मेरी बाल कविता

"गुब्बारे"
बच्चों को लगते जो प्यारे।
वो कहलाते हैं गुब्बारे।।
 
गलियोंबाजारोंठेलों में।
गुब्बारे बिकते मेलों में।।
 
कालेलालबैंगनीपीले।
कुछ हैं हरेबसन्तीनीले।।
 
पापा थैली भर कर लाते।
जन्म-दिवस पर इन्हें सजाते।।
 
फूँक मार कर इन्हें फुलाओ।
हाथों में ले इन्हें झुलाओ।।
सजे हुए हैं कुछ दुकान में।
कुछ उड़ते हैं आसमान में।।
मोहक छवि लगती है प्यारी।
गुब्बारों की महिमा न्यारी।।