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05 मार्च, 2015

“होली का त्यौहार” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


गुड़िया गुझिया बना रही है,
दादी पूड़ी बेल रही है।
 

कभी-कभी पिचकारी लेकर,
रंगों से वह खेल रही है।।

तलने की आशा में आतुर
गुझियों की है लगी कतार।

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घर-घर में खुशियाँ उतरी हैं,
होली का आया त्यौहार।।

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मम्मी जी दे दो खाने को,
गुझिया-मठरी का उपहार।
सजता गुड़िया के नयनों में,
मिष्ठानों का मधु-संसार।।

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सजे-धजे हैं बहुत शान से
मीठे-मीठे शक्करपारे।
कोई पीला, कोई गुलाबी,
आँखों को ये लगते प्यारे।। 


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होली का अवकाश पड़ गया,
दही-बड़े कल बन जायेगें।
चटकारे ले-लेकर इनको,
बड़े मजे से हम खायेंगे।।


1 टिप्पणी:

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