![]() पापा की लग गई नौकरी, देहरादून नगर बाबा। कैसे भूलें प्यार आपका, नहीं सूझता कुछ बाबा।। छोटा घर है, नया नगर है, सर्द हवा चलती सर-सर है, बन जायेंगे नये दोस्त भी, अभी अकेले हैं बाबा। प्यारे चाचा-दादी जी की, हमको याद सताती है, विद्यालय की पीली बस भी, गलियों में नहीं आती है, भीड़ बहुत है इस नगरी में, मँहगाई भी है बाबा। आप हमारे लिए रोज ही, रचनाएँ रच देते हो, बच्चों के मन की बातों को, सहज भाव से कहते हो, ब्लॉग आपका बिना नेट के, कैसे हम देखें बाबा। छोटी बहना प्राची को तो, बाबा-दादी प्यारी थी, छोटी होने के कारण वो, सबकी बहुत दुलारी थी। बहुत अकेली सहमी सी है, गुड़िया रानी जी बाबा। गर्मी की छुट्टी होते ही, अपने घर हम आयेंगे, जो भी लिखा आपने बाबा, पढ़कर वो हम गायेंगे, जब भी हो अवकाश आपको, मिलने आना तुम बाबा। |
यह ब्लॉग खोजें
देहरादून लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
देहरादून लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
20 जनवरी, 2012
"मिलने आना तुम बाबा" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")
सदस्यता लें
संदेश (Atom)

